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Aandhi Mein Soch Samajhkar Bahe Matlab Josh Mein Hosh Bhi Rahe(Hindi Article)

Article By: Munna
Editorial and opinion



बात ये है कि इसके स्वरूप को लेकर इसके बनाने वाले और जनता की सोच में बहुत फर्क है. जनता एक व्यापक पैमाने पे परिवर्तन की आस को लेकर सडको पर है और वोही जनलोकपाल एक ऐसी संस्था है जिसे और संस्थाओ की तरह ही लोकतान्त्रिक दायरों में रहकर ही समस्या का निदान करना है. इतनी उम्मीदें एक संस्था से पालना कितना सही है और भविष्य में अपने बिखरी उम्मीदों के साथ इस संस्था से कैसे तादात्म्य रख पायेंगे ये सोचने वाली बात है. मेरे कहने का तात्पर्य ये है कि अगर जनता खुद अपने आचरण को पहले सुधार कर फिर क्रांति क्रांति करती सडको पर तो समझ में आता कि जन लोकपाल वास्तव में अलादीन का चिराग साबित होता. बिना व्यक्तिगत स्तर पे सुधार के हम सोचे कोई संस्था आकर हमारा कल्याण कर देगी बिल्कुल वाहियात की बात है. एक ढोंग है. एक महा पाखण्ड है और कुछ नहीं. समझ में नहीं आता कि जनता को सडको पे उतारने वाले जनता को इतना चराते क्यों है. क्यों नहीं अपने मूल उद्देश्यों को भली भाँती जनता के सामने और उनके सामने नहीं रखते जिनसे वो आग्रह रखते है अपनी बात मनवाने का. और यही पे आके सारी क्रांति और जोश का सत्यानाश हो जाता है. भ्रम या अँधेरे में रखकर या रहकर या अति उत्साह में उद्देश्यों से अनजान रहकर स्वर्णिम भविष्य की उम्मीद रखना मै नहीं समझता बहुत जायज है.


Submitted:Aug 20, 2011    Reads: 17    Comments: 5    Likes: 1   


 

20AUG

 

20AUG

 

 

 

 

 

जोश में होश भी रहे !

जोश में होश भी रहे !

 

जो भी वास्तव में सोच रहे है वो देख सकते है कि कौन कौन से खतरे अन्ना को नीलने के लिए खड़े है.  जैसा कि जे पी के साथ हुआ बहुत संभव है वो अन्ना के साथ भी हो . उसकी वजह यही है कि अन्ना सांपो के साथ चल रहे है जो कभी भी पलट कर डस सकते है. कमजोरी भीड़ में तो है ही जो कि सदा जोश से काम लेती है होश से नहीं पर सबसे बड़ा दोष नीतिगत है.  नीतिगत इस मामले में है कि जिनके हाथ में वास्तविक कमान है उनका लोकतान्त्रिक मूल्यों से कोई ख़ास सरोकार नहीं है. अब जब लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से आप को कोई ख़ास लगाव नहीं है तो ज़ाहिर है ये उम्मीद रखना कि भविष्य में आप लोकतान्त्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए आप  मर्यादित आचरण कर पाएंगे मुझे नहीं लगता.

सीधी सी बात है मजबूत ईमारत कभी कमजोर नींव पे नहीं खड़ी हो सकती. काबिल लोग जाने क्या सोचते है ये तो वो जाने  पर मै तो इतना जानता हू कि यहाँ नींव बेहद कमजोर है. कोई मुझसे कह रहा था पता नहीं वो कितना सच कह रहा था या झूठ पर उन्होंने कहा कि जो सदस्य लोकपाल की ड्राफ्टिंग में शामिल है वोही महाभ्रष्ट की श्रेणि में आते है. एक महाभ्रष्ट अग्निवेश नाम के पाखंडी को तो मै भी जानता हू. जब इस तरह के संदिग्ध आचरण वाले आपके नीतिगत फैसलों में दखल देने का अधिकार है तो समझ में नहीं आता कि लोकपाल के सन्दर्भ में लिए जा रहे फैसलों का वास्तविक स्वरूप क्या होगा.  मुझे तो जॉर्ज ऑरवेल के द्वारा रचित “एनिमल फार्म ” की याद आ रही है जिसमे सत्ता के मद में सूअर नियंत्रण से बाहर होकर तमाम कुकर्मो में लिप्त हो जाते है. ऐसा तभी होता है जब आपकी शुरुवात ही गलत तरीकें से हो. तकलीफ तो यही कि हम एक तूफ़ान को जन्म तो दे देते पर अक्सर इसकी पृष्ठभूमि में कमजोर स्क्रिप्ट होती है. अंतत: जनता ठगा सा महसूस करती है और एक नया भ्रष्ट तंत्र खड़ा हो जाता है. जनता एक बार फिर अपने विश्वास के टुकड़े टुकड़े होता देखती रह जाती है.

 

चूहे के पीछे बिल्ली और बिल्ली के पीछे डागी और उसके पीछे कोई और तो ऐसे तो कोई फायदा नहीं होगा. कुल मिला के चीखना चिल्लाना तात्कालिक रूप से जायज हो सकता है पर सही जीत चिंतन, मंथन और उसके समुचित क्रियान्वन से होती है. और मुझे लगता है इसका नितांत अभाव है अन्ना की आंधी में. बात ये है जब तक हम खुद व्यक्तिगत स्तर पे ईमानदार नहीं होंगे तब तक कोई भी संस्था कुछ नहीं कर पाएगी चाहे वो सुपर लोकपाल ही क्यों ना हो.  इस आन्दोलन कि दो सबसे बड़ी कमिया है. एक तो ये कि ये भी अभी तक जो जन लोकपाल का मोटा मोटा स्वरूप समझ  में आ रहा है वो तो यही है कि एक ही संस्था में असीमित शक्ति होगी और इसकी जवाबदेही किसके  प्रति और किस स्वरूप में होगी ये बिल्कुल अनिश्चित है. यही इसका सबसे बड़ा दोष है.  दूसरा सबसे मूलभूत फर्क ये है कि जनता की अपेक्षाए और उनकी अपेक्षाए जो इस जन लोकपाल नाम का तीर छोड़ रहे है उसमे बहुत फर्क है. जनता  तो शायद यही समझ रही है या उसें महसूस कराया जा रहा है कि जन लोकपाल एक ऐसी जादू की छड़ी है कि घुमाया और सब समस्या ख़त्म. 

 

अन्ना लहर देखे क्या गुल खिलाती है?

अन्ना लहर देखे क्या गुल खिलाती है?

बात ये है कि इसके स्वरूप को लेकर  इसके बनाने वाले और जनता की सोच में बहुत फर्क है.  जनता एक व्यापक पैमाने पे परिवर्तन की आस को लेकर सडको पर है और वोही जनलोकपाल एक ऐसी संस्था है जिसे और संस्थाओ की तरह ही लोकतान्त्रिक दायरों में रहकर ही समस्या का निदान करना  है.  इतनी उम्मीदें एक संस्था से पालना कितना सही है और भविष्य में अपने बिखरी उम्मीदों के साथ इस संस्था से कैसे तादात्म्य रख पायेंगे ये सोचने वाली बात है. मेरे कहने का तात्पर्य ये है कि अगर जनता खुद अपने आचरण को पहले सुधार कर फिर क्रांति क्रांति करती सडको पर तो समझ में आता कि जन लोकपाल वास्तव में अलादीन का चिराग साबित होता. बिना व्यक्तिगत स्तर पे सुधार के हम सोचे कोई संस्था आकर हमारा कल्याण कर देगी बिल्कुल वाहियात की बात है. एक ढोंग है.  एक महा पाखण्ड है और कुछ नहीं. समझ में नहीं आता कि जनता को  सडको पे उतारने वाले जनता को इतना चराते क्यों है. क्यों नहीं अपने मूल उद्देश्यों को भली भाँती जनता के सामने और उनके सामने नहीं रखते जिनसे वो आग्रह रखते है अपनी बात मनवाने का. और यही पे आके सारी क्रांति और जोश का सत्यानाश हो जाता है. भ्रम या अँधेरे में रखकर या रहकर या अति उत्साह में उद्देश्यों से अनजान रहकर स्वर्णिम भविष्य की उम्मीद रखना मै नहीं समझता बहुत जायज है. 

बहरहाल जनता सडको पर है और ये हर्ष की बात है. ये भी सुखद है कि सत्ता के नशे में चूर लोगो को उनकी औकात समझ में आ गयी. मनीष तिवारी और कपिल सिब्बल जैसे लोगो को कम से कम इतना समझ में तो आया कि जनता से और जनता को लेकर चलने वालो से कैसे “जी” लगाकर बात करनी चाहिए. मुझे कोई शौक नहीं आसमान में उड़ते गुब्बारे में छेद करने का. सो चलिए इस आंधी में हम भी बहते है इस उम्मीद में कि आंधी वैसे तो कभी अच्छा फल नहीं देती पर क्या पता इस आंधी  से विध्वंस के बजाय कुछ काम का निर्माण हो जाए. पर हा फर्क यही है कि  आंधी में बहते हुए भी मैंने अपनी समझ को बहने नहीं दिया. सो ये सोचने पे मजबूर हू कि विश्वास को बार बार  टूट कर जुड़ते हुए देखना या इसकी कोशिश करना बहुत ही तकलीफदेह होता है. इस दर्द को सहज रूप से आत्मसात करना खेल नहीं. और ये खेल अफ़सोस है कि संवेदनशील भोली भारतीय जनता के साथ बार बार खेला जाता है.

 सच तो ये है कुसूर अपना है …
चाँद को छूने की तमन्ना की
आसमा को जमीन पर माँगा 
फूल चाहा कि पत्थरों  पर खिले..
काँटों में की तलाश खुशबू की 
आरजू  की कि आग ठंडक दे 
बर्फ में ढूंढते रहे गर्मी 
ख्वाब जो देखा, चाहा सच हो जाये 
इसकी हमको सजा तो मिलनी थी 
सच तो ये है कुसूर अपना है..


(जावेद अख्तर )

 





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