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Akal Nahi Nakal Ke Sahare Paas Hote Ladke

Article By: Munna
Editorial and opinion



क्या हमको नहीं लगता ये रोज़ी रोटी के लिए पैदा की गयी शिक्षा व्यवस्था से हमने सिर्फ शोषण को जन्म देने वाली व्यवस्था पैदा की है ? क्या शिक्षा व्यस्था का उद्देश्य ये नहीं होना चाहिए कि मानवीय मूल्यों की रक्षा हों और मनुष्य के आत्मसम्मान के साथ खेलवाड़ ना हो. क्या फायदा इस शिक्षा व्यस्था का जिसने इस व्यवस्था को जन्म दिया हो कि लाशो पर भी दलाली चल रही हो ? शिक्षा रुपैया पैदा करने का साधन नहीं मनुष्य को बेहतर बनाने का साधन है. जब तक नहीं समझेंगे तब जवानी लाइनों में सडती रहेगी!!!


Submitted:Apr 13, 2012    Reads: 23    Comments: 0    Likes: 0   



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मुझे याद आते है स्कूल के दिन जब चीटिंग करने के नायाब तरीके लोगो हम लोगो ने इजाद कर रखे थे. ये एक बहुत गौड़ रूप में छोटे स्तर पर व्याप्त था. मतलब इतनी ही नक़ल हम कर पाते थे कि इशारे से आगे वाले से कुछ पूछ लिया और अगर ईश्वर मेहरबान रहा और आगे वाला बंदा अच्छे मूड में रहा तो एक दो सूत्र बता देता था. इससें ज्यादा कुछ नहीं क्योकि इंग्लिश मीडियम के स्कूल में जल्लाद रूपी मैम के चलते इससें ज्यादा जुर्रत किसी की नहीं होती थी और यदि धर लिए गए तो फिर तो खैर नहीं. अब जैसे एक वाकया याद आता है कि फिजिक्स टेस्ट में कुछ नहीं आ रहा था. इज्ज़त बची रहे इस खातिर हिम्मत जुटा के अपने ठीक पीछे बैठी पढने में तेज़ लड़की से कुछ पूछा तो इस कदर आँख दिखाई कि फिर किसी से कुछ पूछ नहीं पाया. मामला इतना आसान रहता तो मै भूल गया होता हुआ. हुआ यही कि टीचर ने उस दिन कापी आगे पीछे एक्सचेंज करके चेक करवा दी. जिस लड़की से पूछा था उसी के पास कापी भी चेक करने चली गयी. जो नंबर मिल सकते थे वे भी चले गए. खैर इस मासूम से माहौल से गुज़रते हुए हम सब ने आगे चलकर मेहनत के बल पे सफलता हासिल की. पर आज का परिदृश्य बहुत बदला सा नज़र आता है. गुरु और शिष्य के समीकरण विकृत तो हुए ही है पठन पाठन का माहौल भी बहुत रसातल में चला गया है.

आज नक़ल सुनियोजित होती है जिसमे माफिया पैसे लेकर ठेके पे नक़ल कराते है ना करने देने पर प्रिंसिपल से लेकर गुरूजी तक को ठोक दिया जाता है. आज मास्टर साहब की सक्षमता इस बात से मापी जाती है कि वे नक़ल करा पाने में काबिल है कि नहीं. कापिया बदल दी जाती है. चेले लोग गुरु से सफा सफा पूछते है नक़ल की क्या व्यवस्था है जैसे कि नक़ल पे उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो. जो नक़ल करके पास हो गया वो सिकंदर और जो ना कर पाया वो सड़क पे मदारी के हाथो नाचने वाले बन्दर सी शक्ल वाला हो जाता है. हालात ये है कि जो कभी उन हालातो में पास हुएँ है जब नकल नहीं हुई बोर्ड में तो कहते है साहब हम तो कल्याणजी के ज़माने में बोर्ड परीक्षा पास किये है. एक वक्त ऐसा आया कि नक़ल की इतनी छूट मिली कि गोबर गणेश टाईप के बहुत सारे पप्पू भी अस्सी परसेंट से पास हो गए. बात थोड़ी गंभीर है. इतने झुण्ड के झुण्ड बच्चे इस तरह थोक के भाव पास हो रहे है और उतने ही थोक के भाव कुकुरमुत्ते की तरह उग आये इंजिनीयरिंग कालेज में एडमिशन भी ले रहे है. जो नहीं पैसा जुटा पाए वे यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिए फिर लग गए आई ए एस की तैयारी में!! य़ूजीसी इस बात से हैरान परेशान है कि रिसर्च की गुणवत्ता में काफी गिरावट आई है. अब ये नहीं समझ में आता कि इस तरह की प्राथमिक और उच्च शिक्षा हासिल करने वाले अच्छे शोध पत्र कैसे तैयार करेंगे ?

प्राथमिक का हाल ये है कि मिड डे मील कैसे बने प्रिंसिपल साहब इसी में उलझे रहते है. नए कानून के मुताबिक बच्चो के स्कूल में रहना अनिवार्य है अब इस अनिवार्यता को पूरी करने की धुन में सब परेशान है. जो बच्चे अंग्रेजी मीडियम में अन्य बोर्ड से पढ़ रहे है उन पर ज्यादा बोझ ना पड़े इसलिए ग्रेडिंग सिस्टम आ गया है. अब बच्चे आसानी से पास हो सकते है. ऐसे पास होके आगे क्या करेंगे राम जाने पर हा जो सक्षम है वे अच्छी महंगी कोचिंग करके किसी एम एन सी में आगे जाके खप जायेंगे. पर बाकी क्या करेंगे ? वे चेन छीनेगे, उत्पात मचायेंगे, राजनैतिक कार्यकर्ता बनके लूटपाट करेंगे, छेड़छाड़ करेंगे और इसके सिवा ना खप पाने वाले बच्चो और युवको का क्या भविष्य है ? अभी अखिलेश सिंह ने सेवायोजन नाम का जिन्न पैदा किया और इतने सारे युवक युवतियां इसे अपने वश में करने निकल पड़े की प्रशासन के पसीने छूट गए. क्या ऐसी मारा मारी नहीं बताती कि हमने किस तरह कि शिक्षा व्यवस्था कायम की है कि जिसमे इस तरह से लोग नौकरी के लिए मरकट रहे है? रोज ही पढ़ता हूँ मिलिटरी भर्ती के दौरान भदगड मची, लाठीचार्ज हुआ, या लोग फार्म लेने या जमा करते वक्त लाइन में बेहोश हो गए, भर्ती परीक्षाओ में इतने परीक्षार्थी आये कि सब जगह अव्यवस्था फैल गयी. इस देश में लोग तब तक सरकारी नौकरी का फार्म भरते रहते है जब तक उम्र से मजबूर ना हो जाए. और सरकारी नौकर बनकर किस तरह मानव से दानव बनते ये एक अलग दास्तान है. या कॉल सेंटर टाईप संस्थान में घुस के “पिराईवेट” ( प्राइवेट) गुलाम बन के किस तरह जीवन यापन कर रहे है ये एक अलग कहानी है.

क्या हमको नहीं लगता ये रोज़ी रोटी के लिए पैदा की गयी शिक्षा व्यवस्था से हमने सिर्फ शोषण को जन्म देने वाली व्यवस्था पैदा की है ? क्या शिक्षा व्यस्था का उद्देश्य ये नहीं होना चाहिए कि मानवीय मूल्यों की रक्षा हों और मनुष्य के आत्मसम्मान के साथ खेलवाड़ ना हो? क्या फायदा इस शिक्षा व्यस्था का जिसने इस व्यवस्था को जन्म दिया हो कि लाशो पर भी दलाली चल रही हो ? शिक्षा रुपैया पैदा करने का साधन नहीं मनुष्य को बेहतर बनाने का साधन है. जब तक नहीं समझेंगे तब जवानी लाइनों में सडती रहेगी!!!


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