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Bhookh Aur Bachpan Se Ek Sakshatkar

Article By: Munna
Editorial and opinion



जब पेट का आकार बड़ा सा लगता है
जब इंसान भगवान पर दोष मढ़ता है
जब भरी हुई थाली महबूबा लगती है
जब महबूबा सुंदर कम स्वादिष्ट ज़्यादा दिखती है
तब दिल से एक हूक उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

-पंकज रामेन्दू मानव


Submitted:Apr 9, 2012    Reads: 19    Comments: 0    Likes: 0   



कुछ दिन पहले अपने मित्र प्रखर पाण्डेय जो ग्वालिअर में बसे एक बहुत शानदार कवि है से एक संवाद के दौरान पंकज रामेन्दू मानव जी की कुछ कवितायेँ सामने उभर कर आई. पढ़ते ही ये दो कविताये मेरे मन के बहुत अन्दर तक समा गयी. तभी सोच लिया था की इसे अपने इस वेबसाइट पर इनको जगह दूंगा ताकि ये कुछ और उर्वर दिमागों तक पहुच सके. शायद आदमी को इस कदर झकझोर कर रख देने की ताकत सिर्फ कविता में ही होती है. पंकज जी की इस अति सूक्ष्म संवेदनशीलता को सराहने के लिए शब्द कम है.

ये बताना आवश्यक है कि इसमें से पहली कविता “बचपन” जो कि एक पुरस्कृत कविता है और कवि का परिचय, जो कविता के नीचे मैंने दिया है, पहले पहल हिंदी युग्म नाम के वेबसाइट पर पर प्रकाशित हुई है. हिंदी युग्म इस वजह से विशेष साभार का अधिकारी है.

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                                          बचपन

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हंसता बचपन, गाता बचपन
जगता और जगाता बचपन,
धूल मिट्टी से सना हुआ
जीने के गुर सिखाता बचपन.
जोश जुनूं से भरा हुआ,
सबसे प्यार जताता बचपन।

कई और रूप हैं बचपन के
द्रवित स्वरूप हैं बचपन के
कबाड़ी बचपन, दिहाड़ी बचपन
कपड़ा सिलता बचपन, कचरा बीनता बचपन
किताब बेचता बचपन, हिसाब सीखता बचपन
हाथ फैलाता बचपन, दूत्कार खाता बचपन
पान खिलाता बचपन, चौराहे की तान सुनाता बचपन
लुटा हुआ सा बचपन, पिटा हुआ सा बचपन
दो जून की जुगाड़ में जुटा हुआ सा बचपन

बचपन रिक्शेवाला, बचपन जूतेवाला
बचपन कुल्फीवाला, बचपन होटलवाला
बचपन चने-मुरमुरेवाला, बचपन बोतलवाला
चाय बेचता बचपन, बोझा खींचता बचपन
गर्मी से लुथड़ा बचपन, सर्दी में उघड़ा बचपन
बूढ़ा बचपन बिना रीढ़ का कुबड़ा बचपन
सहमा बचपन, सिसका बचपन
पहाड़ी ज़िंदगी से बिचका बचपन

बचपन एक विवाद सा, घाव से निकले मवाद सा
बचपन एक बीमारी सा, जी जाने की लाचारी सा
बचपन थका हुआ सा, बचपन झुका हुआ सा
जीवन की पटरी पर, बचपन रुका हुआ सा

जूझता सा बचपन, टूटता सा बचपन
बिखरता सा बचपना, अखरता सा बचपन
अपने अस्तित्व को ढुंढता सा बचपन
कचरे सी ज़िंदगी में खुशिया तलाशता
हमसे कई सवाल पूछता सा बचपन ।

– पंकज रामेन्दू मानव

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भूख ऐसी ही होती है


भूख की उम्र नहीं होती..जात नहीं होती..
जब घुटने से सिकुड़ा पेट दबाया जाता है
जब मुँह खोल कर हवा को खाया जाता है
जब रातें, रात भर करवट लेती हैं
जब सुबह देर से होती है
जब चाँद में रोटी दिखती है
तब दिल में यह आवाज़ उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब गिद्ध मरने की राहें तकता है
जब कचरे में भी कुछ स्वादिष्ट दिखता है
जब कलम चलाने वाला बार-बार दाल-चावल लिखता है
जब एक वक़्त की खातिर जिगर का टुकड़ा बिकता है
जब रातें सूरज पर भारी होती हैं
तब दिल से एक आवाज़ होती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब हांडी में चम्मच घुमाने का कौशल दिखलाया जाता है
जब चूल्हे की आँच से बच्चों का दिल बहलाया जाता है
जब माँ बच्चों की कहानी सुना, फुसलाती है
जब सेहत की बातें बता ज़्यादा पानी पिलवाती है
जब रोटी की बातें ही आनंदित कर जाती हैं
तब दिल से एक हूक उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब पेट का आकार बड़ा सा लगता है
जब इंसान भगवान पर दोष मढ़ता है
जब भरी हुई थाली महबूबा लगती है
जब महबूबा सुंदर कम स्वादिष्ट ज़्यादा दिखती है
तब दिल से एक हूक उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब एक टुकड़ा ज़िंदगी पर भारी लगता है
जब तिल-तिल कर जीना लाचारी लगता है
जब बातें रास नहीं आती
जब हंसना फनकारी लगता है
जब एक निवाले पर लड़ती भौंक सुनाई देती है
तब दिल से एक हूक उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

- पंकज रामेन्दू मानव

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कवि पंकज रामेन्दू मानवजी का परिचय:

इनका जन्म मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में २९ मई १९८० को हुआ। इनको पढ़ने का शौक बचपन से है, इनके पिताजी भी कवि हैं, इसलिए साहित्यिक गतिविधयों को इनके घर में अहमियत मिलती है। लिखने का शौक स्नातक की कक्षा में आनेपर लगा या यूँ कहिए की इन्हें आभास हुआ कि ये लिख भी सकते हैं। माइक्रोबॉयलजी में परास्नातक करने के बाद P&G में कुछ दिनों तक QA मैनेज़र के रूप में काम किया, लेकिन लेखक मन वहाँ नहीं ठहरा, तो नौकरी छोड़ी और पत्रकारिता में स्नात्तकोत्तर करने के लिए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय जा पहुँचे। डिग्री के दौरान ही ई टीवी न्यूज़ में रहे। एक साल बाद दिल्ली पहुँचे और यहाँ जनमत न्यूज़ चैनल में स्क्रिप्ट लेखक की हैसियत से काम करने लगे। वर्तमान में ‘फ़ाइनल कट स्टूडियोज’ में स्क्रिप्ट लेखक हैं और लघु फ़िल्में, डाक्यूमेंट्री तथा अन्य कार्यक्रमों के लिए स्क्रिप्ट लिखते हैं। कई लेख जनसत्ता, हंस, दैनिक भास्कर और भोपाल के अखबारों में प्रकाशित।

श्रोत: हिंदी युग्म

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चलते चलते गुलाल का ये गीत भी सुन ले..इसके बोलो की जितनी भी प्रसंशा की जाए कम है..जिस तूफानी और जोशीले अंदाज़ में गाया गया है ये गीत उसके तो क्या कहने. पियूष मिश्र जो की इस फिल्म के गीतकार और संगीतकार भी है बधाई के पात्र है कि इन्होने भारतीय फ़िल्म संगीत के इतिहास को इतना दुर्लभ गीत दिया. और पता है इस गीत को गाया किसने है ? खुद पियूष मिश्र ने  …इसके बोल यहाँ पे है.

http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=_Jzl5uICMXY


श्रोत साभार:

हिंदी युग्म

चित्र साभार:

Pics One

Pics Two

 





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