Welcome Visitor: Login to the siteJoin the site

Chalo Thoda Sa Muskura Le, Thoda Sa Jee Le (Hasya Lekh)

Article By: Munna
Editorial and opinion



आफिस में दुम फटकारना बहुत बड़ा कर्मयोग है, कुत्ते कही के, ढोंगी कही के, पाखंडी है ये सब। ईश्वर के अस्तित्व को मै इसी बात से स्वीकार करता हूँ कि इस तरह के वातावरण और ढ़ोंगपने से उसने बचाया।


Submitted:Oct 20, 2012    Reads: 34    Comments: 0    Likes: 0   


गंभीर लिखते लिखते मन बोझिल सा हो गया तो सोचा जरा सा मुस्कुरा ले, जरा सा आराम कर ले। पता नहीं किस कवि की पंक्तिया है पर मुझे हंसने और मुस्कुराने के लिए बाध्य कर रही है:’चलो आज बचपन का कोई खेल खेलें, बड़ी मुद्दत हुई बेवजह हंस कर नहीं देखा’। मेरी एक परम मित्र है। बड़ी दुखिया स्त्री है पर काम करने के मामले में नान स्टाप एक्सप्रेस है। लिहाजा हमेशा मेरा उससें छत्तीस का आंकड़ा रहता है काहे कि अपने स्वास्थ्य की कीमत पर काम करती है। मैंने उससें कह रखा है जब मरने लगना मुझे खबर जरूर करना तुम्हारे कब्र के ऊपर मै ये लिखवाऊंगा ” ये रही मेरी मित्र जिसने मुझ जैसे जीवंत शख्स को दो मिनट भी एक मगरूर, जिद्दी, बिगडैल हसीना की तरह एहसान जता के दिए लेकिन आफिस के घटिया वातावरण में बेजान आंकड़ो को खूब रस ले के प्रेम किया। इस महान बुद्धिमान स्त्री को मेरा नमन जिसकी मौत आफिस का काम करते करते हुईं।ईश्वरइसकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे जो “हैवन द स्वर्ग” में तो कम से कम आराम करे।”

ऐसा लिखवाने के बाद मेरी आत्मा को बहुत शान्ति मिलेगी। और उन मेरे जाहिल मित्रो से नफरत और दूरी और घनी हो जायेगी जो आफिस में सड़को पे फिरते आवारा कुत्तो की तरह इधर उधर दुम फटकारने को “आराम हराम है” सा समझते है । आफिस में दुम फटकारना बहुत बड़ा कर्मयोग है, कुत्ते कही के, ढोंगी कही के, पाखंडी है ये सब। ईश्वर के अस्तित्व को मै इसी बात से स्वीकार करता हूँ कि इस तरह के वातावरण और ढ़ोंगपने से उसने बचाया। मुझे खूब काम करना सिखाया पर उसको जताना नहीं सिखाया। अब मै अपनी बकैती बंद करता हूँ और आपको आराम तत्त्व को प्रतिपादित करती ये कविता पढवाता हूँ। मेरे जीवन दर्शन को प्रकट करती है और अपने दुखिया मित्र को तन्हाई में कोसने में मदद करती है। एक लेखक को किसी दूसरे अच्छे लेखक की बातो को फैलाना चाहिए। उसे चोरी से अपने नाम से नहीं छपवाना चाहिए। या सिर्फ अपना ही लिखा दुसरो पे नहीं थोपना चाहिए।

तो आप सब लोग गोपाल प्रसाद व्यास की इस बेहद शानदार हास्य कविता को पढ़कर मेरी तरह मुस्कुराना सीखे, मेरी तरह आराम करना सीखे।

********************************************************************

“आराम करो”

एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ — है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ — सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब ‘सुख की नींद’ कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

- गोपालप्रसाद व्यास

***********************

Pic Credit:

Pic One





0

| Email this story Email this Article | Add to reading list



Reviews

About | News | Contact | Your Account | TheNextBigWriter | Self Publishing | Advertise

© 2013 TheNextBigWriter, LLC. All Rights Reserved. Terms under which this service is provided to you. Privacy Policy.