[ पाठको से अनुरोध है कि इस लेख को बेहतर समझने के लिए इस चर्चा को अवश्य देखे जो कि इस लेख पे हुई है श्रोता बिरादरी पर : की बोर्ड पे बोल फिट कर गीत रचने वाले ये आज के बेचारे संगीतकार. इस लेख के कमेन्ट बॉक्स में चर्चा को डाल दिया गया है. यदि उसे पढ़कर इस लेख को पढेंगे तो ज्यादा आनंद आएगा ]
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इस बात को देख के मुझे बहुत हर्ष हो रहा है कि जिस स्तर कि ये चर्चा हो रही है वो बहुत दुर्लभ है. दिलीपजी की जितनी भी प्रसंशा की जाए वो कम है क्योकि मुझे लगता है कि वो ना सिर्फ समस्या क्या है उसको समझ रहे है या उसको बहुत इमानदारी से समझने की कोशिश कर रहे है बल्कि नए नए तथ्यों के साथ और नए एंगल से चीजों को समझा रहे है. मै कुछ नयी बातें कहूँ इसके पहले जो कुछ बाते कही गयी है उनको समेटते हुए कुछ कहना चाहूँगा. सजीव सारथी जी की बातो को संज्ञान में लेना चाहूँगा. सजीवजी आप बेहद अनुभवी है और आपकी समझ की मै दाद देता हूँ. आप बहुत नज़दीक से संगीत जगत में हो रहे बदलाव को नोटिस कर रहे है. लिहाजा आपकी बात को इग्नोर करना या फिर इसके वजन को कम करके तोलना किसी अपराध से कम नहीं और मै तो इस अपराध को करने से रहा. बल्कि मै तो खुश हूँ इस बात से कि आपने कितने गंभीरता से अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है. मै चूँकि किसी अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य में व्यस्त था लिहाज़ा कमेन्ट कर नहीं पाया पर रस बहुत ले रहा था आप के, दिलीपजी, अरुणजी और संजयजी की बातो का. मै कुछ बातो को अपने स्टाइल से कहूँगा जो सरसरी तौर से देखने वालो को ऊँगली करना लग सकता है पर यदि आप मनन करे तो उसके छुपे आयाम आपको नज़र आ सकते है. कृपया सम्मानित सदस्य इसे एक हेअल्थी रेजोएँडर (healthy rejoinder) के ही रूप में ग्रहण करे और चूँकि आप लोग बेहद काबिल है संगीत के सूक्ष्म पहलुओं को ग्रहण करने में तो उम्मीद करता हूँ कि इन बातो को सही आँख से देखने की कोशिश करेंगे..
सजीवजी आपकी कुछ बातो की तरफ आपका ध्यान खीचना चाहूँगा. एक बात तो संगीत के विविधता के सन्दर्भ में है और वो ये है कि ” उस आलेख से आप वाह वाही लूट सकते हैं पर समय के साथ हमारे संगीत में आ रही विविधताओं पर भी कुछ लिखिए “. देखिये साहब हम बहुत युवा है इतने उम्रदराज़ नहीं हुएँ है कि आज के बदलाव से बेखबर पुराने काल में नोस्टैल्जिया से ग्रस्त होकर भटक रहे है. ऐसा कुछ है नहीं और ना ही ऐसा है कि मार्क्सवादी विचारको की तरह विशुद्ध बौद्धिक बकैती करके ध्यान खीचना या वाह वाही लूटना है. काहे कि ईश्वर की कृपा से दुनियाभर के अति सम्मानित पत्र पत्रिकाओ में, प्रतिष्ठित वेबसाइट्स पर मेरे आलेख छपे है विभिन्न विषयो पे और इतनी प्रसंशा मिली [धन नहीं ] कि ना अपनी प्रसंशा सुनने का मन होता है और ना सिर्फ बात कहने के खातिर बात करने का मन करता है…Enough is enough ,at least, in this regard. मै कोई बात तभी कहता हूँ जब लगता है कि कहना बहुत जरूरी हो गया है. मै कोई सर्वज्ञ नहीं पर मेरी भरसक कोशिश यही रहती है कि जितने भी दृष्टिकोण या बदलाव मेरे सामने हो रहे मान लीजिये संगीत के क्षेत्र में ही उनको समझने या आत्मसात करने की पूरी कोशिश करता हूँ . यही देख लीजिये कि आप लोगो अभी इतने सारे अनछुए पहलुओं पर इतने विस्तार से प्रकाश डाला..
पूर्व में भी मै ऐसी ही चर्चाओ में के केंद्र में रहा हूँ तो सजीवजी आप इस बात बात से बेफ्रिक रहे कि संगीत की विविधता को हाशिये में रखने पर मुझे कोई दिलचस्पी नहीं. अगर हाशिये में ही लाना होता तो कम से कम मै किसी भी चर्चा को जन्म ही ना दूँ !! सजीवजी आपने एक बहुत अच्छा काम ये किया कि कम से कम आप बहुत सकरात्मक रूख रखते है आज जो कुछ भी अच्छा हो रहा है. पाजिटिव रूख का मै भी बहुत प्रेमी हूँ लिहाज़ा आपके इस अप्प्रोअच की मै सराहना करता हूँ. लेकिन आप सजीवजी इस बात को थोडा सा गौर करना भूल गए कि ना मै और ना ही दिलीपजी ने कभी इस बात से इंकार किया है कि आज के युग में अच्छा काम नहीं हो रहा है या फिर के आज के यूथ की पसंद ठीक नहीं है. आप मेरे पूर्व के कमेन्ट को एक बार फिर देखे तो आप पाएंगे कि मैंने एम एम क्रीम या शंकर एहसान लोय या सन्देश शांडिल्य की बात की है. दिलीप जी की बात को गौर करे कि उन्हें भी अच्छे योगदान की खबर है : “ Certainly there are many a songs (New) which are sensetively made, composed and appreciated.The issue here is the comparison for dedication and soulful output.” ( Dilip Kawathekar ) ..” for not condemning those who are creative even today, but those who are creating a song in a day, where there is no time to most of Music Directors for any improvisation/excellence/originality.” ( Dilip Kawathekar ). मैंने भी यही कहा है ” I am not against the modern music but I have full right to condemn the wrong traits exhibited by the modern musicians- the arrangers in reality.”
आप सजीवजी इन बातो को इग्नोर कर गए और इसलिए आप का जोर इस तरफ ज्यादा हो गया कि आज कितने अच्छे गीत बन रहे है सिंथेसाईज़र के नोट्स का इस्तेमाल करके या फिर आज के यूथ्स कितने प्रयोग कर रहे है. मुद्दा ये नहीं है सजीवजी .बल्कि दिलीपजी ने इस बात को बेहतर पकड़ा है कि वाकई में मुद्दा क्या है जिसको संजयजी ने रस लेके कहा है कि “ भाई लोग आप सब अभी भी असली मर्ज समझने का प्रयास पूरी तरह नही कर पा रहे है….कि आखिर ऍसा क्यों हो रहा है….” पर मजेदार बात ये है कि संजयजी ने खुद कोई कोशिश नहीं कि है इस मर्ज़ को समझ कर कुछ कहने कि . सिर्फ इंगित करके इस बात को रस ले रहे है..
बहरहाल संजयजी हम मर्ज़ को बताते है अभी. ठहरिये जरा सा. मुद्दा ये है कि आज के गीतों में इतना सतहीपना क्यों आ गया है गीत ना सिर्फ बेसुरे, कानफोडू है बल्कि संगीत के साथ बलात्कार भी है. कुछ अच्छा हो रहा है या कुछ यूथ कैसे भी हो पीछे का संगीत एन्जॉय कर रहे है , कुछ नए प्रयोग कर रहे है ये सब ठीक है पर क्या ये पर्याप्त है कि हम आँख मूँद कर उपेक्षा कर दे जो संगीत के नाम पे शोर मच रहा है ? ये संगीत कि ध्वनी कैसे उत्पन्न हो रही और क्या नए एफ्फेक्ट पैदा हो रहे है ये संगीत के शास्त्रीय जानकारों को भा सकता है पर जरा आम धारणा पे भी तो जाए. जिनके लिए संगीत बन रहा है उनमे क्या सन्देश है. हमारा क्या एक बड़ा तबका इन सतही सिंथेसाईज़र के नोट्स से उत्पन्न गीतों को अपना रहा है कि नहीं ? सीधा सा जवाब है नहीं. दिलीपजी ने इस बात को बात को समझा है और तभी वो मूल वाद्यों के उपयोग पर बल दे रहे है..
इस भ्रम को ना पाले कि माडर्न बीट्स कोई बहुत लोकप्रिय है. तकलीफ ये है कि इन्हें हमारे अन्दर ठूसा जा रहा है बदलाव के नाम पर.. संजयजी ने मर्ज को ना समझने कि बात को कह के कम से कम ये रास्ता खोल दिया कि हम पहले उस गणित को समझे जिसके चलते तहत ए आर रहमान के एक बेहद औसत दर्जे गीत को आस्कर दे दिया गया है ? ये पूंजीवादी संस्कृति की गहरी चाल है कि किसी भी देश कि मूल संस्कृति से काट कर उस को परोसो जो कि ग्लोबल है. नतीजा ये हुआ कि मैनहैटन से लेकर मुंबई तक एक ही तरह का बीट्स वाला संगीत हावी हो गया. नतीजा ये हुआ कि रहमान के औसत दर्जे के संगीत को या इनके ही समकक्ष और भी फूहड़ संगीतकारों के गीतों को जबरदस्ती ग्लोबल का नाम देके प्रमोट किया जाने लगा. ठीक है रोजा में ठीक संगीत दिया या बॉम्बे में अच्छा संगीत दिया पर ए आर रहमान नब्बे के दशक के खत्म होते होते ही “मोनोटोनस” (monotonous) का खिताब पा चुके थे और आश्चर्य है कि यही ऑस्कर कि श्रेणि में जा पहुंचे वो भी “ जय हो ” के लिए !!! इसका कारण आप समझने कि इमानदारी से कोशिश करेंगे तो ही समझ पायेंगे कि गीत इतने बेसुरे क्यों बन रहे है ?
बात साफ़ है कि जहा पहले फ़िल्म संगीत के मूल में भारतीय संगीत की आत्मा बसती थी वहा पे वेस्टर्न संगीत के तत्त्व आ गए बदलाव के नाम पे . ऐसा करने से पहले ऍम टीवी के जरिए हमारे यूथ्स को ऐसा बना दिया गया की वो बीट्स आधारित संगीत को ही असली समझे पैव्लोव के कुत्ते की तरह. पहले जहा गीत फ़िल्म के थीम को ध्यान में रखकर बनते थे. हफ्तों या महीनो लग जाते थे धुन बनाने में और फिर उतनी ही लगन से गीत में अर्थपूर्ण शव्द आते थे.. इन दोनों के बेजोड़ संस्करण से एक मधुर गीत का जन्म होता था. आज ठीक उल्टा है.. आज पहले ये देखा जाता है कि क्या बिक सकता है. कहा कहा म्यूजिक के राइट्स डिस्ट्रीबुउट हो सकते है. इनका आकलन करने के बात ही गीत संगीत बन पता है. मै पूछना चाहूँगा कि क्या शंकर जयकिशन, खैय्याम या कल्यानजी आनंदजी भी इसी प्रोसेस को ध्यान में रखकर संगीत रचते थे? क्या पूर्व में यही एक पैमाना था संगीत को रचने का ?
सजीवजी ठीक है हम कॉन्सर्ट में जाकर मूल वाद्यों या अपनी पसंद का संगीत सुन सकते है या वो जमाना नहीं रहा कि तमाम साजिंदों को इकठ्ठा करके सुर निकले तो क्या हम इनके आभाव में ठूसा जा रहा है उसको चुप मार के निगल ले ? कहा जाता है कि भारतीय संगीत में वो जान होती है कि रोग भाग जाते है या फिर दीपक जल उठता है और तकरीबन यही जान “हीलिंग एफ्फेक्ट” के सन्दर्भ में पुराने फिल्मी गीतों में भी होती थी. क्या आज के शोरनुमा फिल्मी गीत भी इसी ”हीलिंग एफ्फेक्ट” का दावा कर सकते है ? वो इसलिए नहीं कर सकते क्योकि वे आपको शांति या ख़ुशी देने के लिए नहीं वरन पैसो की झंकार से लय बनाने के लिए बने है. आपने कभी गौर किया आपने कोई अच्छी धुन की तारीफ की ये सोचकर बहुत बढ़िया बना है फिर पता चलता है अरे ये तो मूल स्पैनिश गीत की नक़ल है. अरे ये तो फला गीत की नक़ल है इंसपिरेशन के नाम पे. तो ये तमाशा होता है गीत रचने के नाम पे.
सजीवजी अच्छा अब भी हो रहा है और हो सकता है इससें किसे इंकार है. उसकी हम भी तारीफ करते है. ये भी महसूस होता है कि सिंथेसाईज़र के नोट्स इतने प्रचलन में आ चुके है कि अतीत के गोल्डन एरा को याद करना और उसके फिर से आ जाने कि उम्मीद करना बहुत ठीक नहीं. क्योकि बदलाव फिर आखिर बदलाव है. पर मुद्दा ये नहीं है. मुद्दा ये है कि हम इस बदलाव को और विकृत होने से ना रोके? वे कोशिशे करना भी बंद कर दे जिनसे कि उन तत्त्वों की वापसी की संभावना बन सके जो कभी भारतीय संगीत की जान हुआ करते थे. एक संयमित मिलन हो पूरब का पश्चिम से मुझे परहेज़ नहीं पर नकली को ही असली बताना इससें मुझे सख्त ऐतराज़ है. कम से कम मै तो अपनी आपत्ति सख्त रूप से दर्ज करूंगा भले मै अकेला ही क्यों ना हूँ.
उम्मीद करता हू की संजय वर्मा जी को अब थोडा आसानी होगी ये समझने में कि माजरा क्या है. अंत में सजीव सारथी , दिलीप जी, अरुण सेठी जी, संजय वर्मा, प्रभु चैतन्यजी और मंगेश्जी और सागर जी को विशेष धन्यवाद कि मुझे चिंतन करने का नया आधार दिया. आशा है कि थोडा सा अंदाज़ में जो तल्खी आ जाती है इसको इग्नोर करके जो बातो का मूल सार है उसी को ध्यान में रख के आप मेरे लेख पर नज़र डालेंगे. आप सब संगीत को परखने वाले लोग है सो किसी को कम बेसी करके आंकने का मेरा कोई इरादा नहीं और ना भविष्य में होगा. बात संगीत से शुरू होके संगीत पे खत्म होनी चाहिए संगीत की बेहतरी के लिए यही मेरा एकमेव लक्ष्य रहता है हर बार. उम्मीद है आप इसको महसूस करेंगे मेरे अंदाज़ के तीखेपन से ऊपर उठकर.
चलते चलते इस गीत को भी सुनते चले : चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों
संगीतकार : रवि
गीतकार: साहिर
गायक: महेंद्र कपूर
http://www.youtube.com/watch?v=cE5q9kst-Zc
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