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Is Aseem Sambhavnao Se Bhare Desh Ko Tonic Nahi Surgery Ki Zaroorat Hai

Article By: Munna
Editorial and opinion



मित्र जिस देश में कफ़न से लेकर चारा तक में घोटाला हो रहा है वहा पे सिर्फ आशावाद या प्रतीकात्मक कदमो से काम तो नहीं चलने वाला. ये तो वही बात हो गयी कि जिस मरीज़ को सर्जरी की जरूरत हो उसे डॉक्टर साहब टॉनिक देकर घर जाने को कह दे!! इस असीम संभावनाओ से भरे देश को टॉनिक नहीं सर्जरी की जरूरत है. हमारे यहाँ के काबिल नौकरशाह जब पढ़ लिख कर कुर्सी पर बैठते है तो पैसा लूटने की मशीन बन जाते है. कामनवेल्थ से पहले की लूट खसौट पे गौर करो. मायावती के जिन्दा लोगो के "welfare " के बजाय बेजान मूर्तियों से लगाव को देखो. मधु कौडा ने झारखण्ड जैसे कम विकसित राज्य में भी चार हज़ार करोड़ का घोटाला कर दिया इस पर भी गौर करो!! अब बताओ मित्र क्या सिर्फ प्रतीकात्मक आशावाद से इस देश का कल्याण हो सकता है ?


Submitted:Sep 21, 2012    Reads: 8    Comments: 0    Likes: 0   


उम्मीद पे दुनिया कायम है. ऐसा मैंने बहुत से लोगो को कहते सुना है, महसूस करते देखा है. पर क्या उम्मीद के भरोसे चमत्कारी परिणाम की उम्मीद की जा सकती है? नहीं, बिल्कुल नहीं. सिर्फ उम्मीद का दामन थामने से काम नहीं चलता. बड़े और सार्थक बदलाव सिर्फ उम्मीद के सहारे नहीं होते बल्कि उम्मीद और कुशल नीति के समुचित सम्मिश्रण के दम पे होते है. अभी कुछ दिनों पहले मै अपना ही किसी पुराने मित्र को लिखा पत्र पढ़ रहा था. उस में अपने मित्र को जो सिर्फ प्रतीकात्मक तरीको को सब कुछ मान बैठा था को ये समझाने की चेष्टा थी कि सिर्फ मोमबत्ती जुलूसो इत्यादि क्रियाकलापों से बात नहीं बनती. उस पत्र का सम्पादित अंश मै आप सब के सामने रख रहा हूँ. वैसे ये अजीब सी बात है कि मै अपना लिखा हुआ जब कई सालो के बाद पढता हूँ तो ऐसा महसूस होता है कि जैसे किसी दूसरे का लिखा हुआ पढ़ रहा हूँ, ये यकीन कर पाना मुश्किल होता है कि मैंने खुद ये बाते कभी किसी को लिखी थी. सो सबकी तरह मै अपना ही लिखा एक अजनबी की भांति पढता हूँ और अब यही कर रहा हूँ इस पत्र को दुहराते वक्त.

” मित्र जिस देश में कफ़न से लेकर चारा तक में घोटाला हो रहा है वहा पे सिर्फ आशावाद या प्रतीकात्मक कदमो से काम तो नहीं चलने वाला. ये तो वही बात हो गयी कि जिस मरीज़ को सर्जरी की जरूरत हो उसे डॉक्टर साहब टॉनिक देकर घर जाने को कह दे!! इस असीम संभावनाओ से भरे देश को टॉनिक नहीं सर्जरी की जरूरत है. हमारे यहाँ के काबिल नौकरशाह जब पढ़ लिख कर कुर्सी पर बैठते है तो पैसा लूटने की मशीन बन जाते है. कामनवेल्थ से पहले की लूट खसौट पे गौर करो. मायावती के जिन्दा लोगो के “welfare ” के बजाय बेजान मूर्तियों से लगाव को देखो. मधु कौडा ने झारखण्ड जैसे कम विकसित राज्य में भी चार हज़ार करोड़ का घोटाला कर दिया इस पर भी गौर करो!! अब बताओ मित्र क्या सिर्फ प्रतीकात्मक आशावाद से इस देश का कल्याण हो सकता है ?

मित्र आपने कभी गौर किया है कि जो एलिट क्लास कभी वोट देने भी नहीं निकलता पर फिर भी हर सुविधा का पूरा हिस्सा डकार जाता है अपने से कम हैसियत वालो को समाज पर बोझ समझता है और इनसे दूरी बना के रखता है. ये अलग बात है कि इस देश को भूखे नंगे किसान, साधनविहीन लोग ही चला रहे है. आश्चर्य नही कि बाहर वाले इन्हें “slumdogs ” कहते है और हम इस पर ताली बजाकर जय हो करते है. आप का कहना है कि छोटी सी पहल बहुत दूर तक ले जाती है. सही कह रहे हो मित्र. आशावाद के दृष्टिकोण से पर यथार्थ में तो वोही होता है जोमुक्तिबोध बाबा कह रहे है इस कालजयी कविता में :

“भूत बाधा ग्रस्त
कमरों को अंध -श्याम साँय-साँय
हमने बताई तो
दंड हमी को मिला
बागी करार दिए गए ,
चांटा हमी को पड़ा ,
बांध तहखाने में-कुओ में फेंके गए
हमी लोग !!
क्योंकि हमे ज्ञान था ,
ज्ञान अपराध बना !!

खैर मै घोर आशावादी हू इसलिए मै सार्थक पहल वाली तुम्हारी बात की मै उपेक्षा नहीं करना चाहूँगा. ये जानता हू कि भ्रष्टाचार से भरे समाज में प्रतीकात्मक कदमो से कोई ख़ास बात नहीं बनने वाली पर फिर भी दुष्यंत साहब कि ये पंक्तिया भीतर एक अच्छा एहसास पैदा करती है: कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो.”





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