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Key-board Pe Bol Phit Kar Geet Rachane Waale Ye Aaj Ke Bechare Sangeetkaar

Article By: Munna
Editorial and opinion



वे बोले कि आज का तमाशा देखिये कि अब तो पूरा टुकड़ा तो दूर कि बात रही अब एक एक शब्द अलग रिकार्ड होता है. अब ऐसे में गीतों में जान क्या ख़ाक आएगी. कहने का मतलब यही है कि दो कौड़ी की छम्मक छल्लो को जब तक चैनल वाले बजाते रहते है तब तक गीत चलता है. और जैसे ही छम्मक छल्लो बजना बंद हुई वैसे ही वो मर गयी! शैलेन्द्र सिंह को नमन जो इन्होने सच को सच कहा.


Submitted:Nov 4, 2011    Reads: 29    Comments: 13    Likes: 1   


शैलेन्द्र सिंह: सत्तर के रोमांटिक गीतों के एक स्तम्भ

अभी शैलेन्द्र सिंह जी का एक पुराना साक्षात्कार सुनने को मिला.  निम्मी मिश्राजी से उन्होंने इस बुधवार को टेलीफ़ोन वार्ता में विविध भारती के  ” इनसे मिलिए ” कार्यक्रम में अपनी भड़ास जम के निकाली .  उन्होंने जैसे ही पानी पी-पी के आज के संगीतकारों और उनके द्वारा रचित गीतों को कोसा मुझे जरा जरा सा कुछ याद आ गया.

 

 

उन्होंने बहुत पते की बात कही.  उन्होंने कहा कि आजकल के संगीतकार एक  संगीतकार नहीं केवल एक अर्रैन्जर है.   इन्होने कहा कि जैसे ही मुझे संगीतकार ने कहा कि भाई आप अपने वाले टुकड़े गा दो हम इसे संगीत में फिट कर देंगे.  शैलेन्द्र सिंह जी उखड गए और बोले गीत तो मै पूरा रिकॉर्ड करवाऊंगा  नहीं  तो गीत रिकार्ड नहीं होंगा.
 
वे बोले कि आज का तमाशा देखिये कि अब तो पूरा टुकड़ा तो दूर कि बात रही अब एक एक शब्द अलग रिकार्ड होता है.  अब  ऐसे में गीतों में जान क्या ख़ाक आएगी.  कहने का मतलब यही है कि दो कौड़ी की छम्मक छल्लो को जब तक चैनल वाले बजाते रहते है तब तक गीत चलता है.  और जैसे ही छम्मक छल्लो बजना बंद हुई वैसे ही वो मर गयी!  शैलेन्द्र सिंह को नमन जो इन्होने सच को सच कहा.

 

 

ये की बोर्ड पे बोल सेट करके गीत बनाने वाले क्या गीत बनायेंगे पुराने दशको वाला ?  ये सब गीत बनाते नहीं है बल्कि गीतों का उत्पादन करते है.   कहने वाले तो ये भी कहते है कि गीत लिखने वाली  मशीन का भी निर्माण हो चुक है  शायद.  कुछ शब्द डालिए और गीत तैयार.   ये बहुत संभव है आज के टेक्नोलाजी के चलते क्योकि ऐसी वेबसाइट है बहुत सारी जो आपको ऐसे ही प्रारूप पे कविताओ का निर्माण कराती है. कहने का अभिप्राय ये है आजकल गीत संगीत के नाम पर सिर्फ ट्रैक से भटके युवा लोगो ख्याल रखा जा रहा है.  इनको ही  ध्यान में रखकर गीत बनाया जा रहा है.

 

मै कोई बीते युग के मोंह में डूबकर विचरण भटकने वाला जीव नहीं हूँ पर क्या हम उन गुणी संगीतकारों के रचनाओं  की उपेक्षा कर दे जो पूरी तरह  डूब कर गीत का निर्माण करते थे ?  उस समय के गीत आज भी उतने प्रासंगिक है तो उसकी वजह यही है कि ये बड़ी लगन से संगीत के तत्त्वों में घोल कर बनाया गए हुए गीत है.  शायद यही वजह है कि या तो पुराने गीतों के रीमिक्स तैयार हो रहे है नहीं तो या फिर  ” अपनी तो जैसे तैसे  ” या “ दम मारो दम ”  जैसे पुराने लोकप्रिय गीतों को नए अंदाज़ में पेश किया जा रहा है. ये है आज की क्रेअटिविटी. अब “ आधा है चन्द्रमा रात आधी ”  (नवरंग  ) या “ जवाँ है मोहब्बत ”  (अनमोल घडी )  या फिर “ ना ये चाँद होंगा ”  (शर्त )  या “ पिया ऐसे जिया में समय गयो रे ” ( साहब बीवी और ग़ुलाम) जैसे सदाबहार दिल और दिमाग को भावविभोर कर देने वाले गीतों को बना देने की काबिलियत तो इन की बोर्ड से ध्वनी उत्पन्न करने वालो में आने से रही.

बात मै शैलेन्द्र सिंह पर ही खत्म करूँगा. इन्होने बहुत अच्छे गीत हमे दिए और इनको ऋषि कपूर की आवाज़ माना जाता रहा है.  बॉबी के गीत “मै शायर तो नहीं” से उनको जो सफलता मिली उसके बाद इन्होने पीछे मुड़कर नहीं देखा.   तो क्यों ना यही गीत सुने जो कि सत्तर के दशक के नौजवान अपनी प्रेमिकाओ को इम्प्रेस करने के लिए गाते थे और नब्बे के दशक के भी नौजवान यही गीत गाते थे इम्प्रेस करने के लिए बाइक पे बैठकर आइस क्रीम पार्लर की राह देखने वाली प्रेमिकाओ के लिए!!!

पिक्स क्रेडिट: पिक वन 

 





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