लन्दन ओलंपिक विवादों के घेरे में
ये बहुत ख़ुशी की बात है कि तीसवे ओलंपिक में भारत को एक और कांस्य पदक मिल गया और कुल पांच मेडल सहित ये अब तक का हमारा सबसे बेहतर प्रदर्शन है ओलम्पिक में. योगेश्वर दत्तने रैपचेज़ वर्ग के मुकाबले में उत्तर कोरिया के पहलवान को धूल चटाते हुएँ भारत को एक और कांस्य पदक दिला दिया. इन सब को परे रखते हुएँ इस विषय पे ध्यान केन्द्रित करना चाहूँगा कि लन्दन ओलंपिक विवादों के घेरे में आ गया है और पक्षपात से जुड़े बयान सुर्खियों में आ गए है. इन बयानों को गंभीरता से लेने की जरुरत है. इन्हें हारे हुए देशों की भड़ास कहकर खारिज करने की भूल ना करे.
एक मेडल जो अमेरिका हमारा खा गया चोरी से जब हमारे मुक्केबाज़ विकास कृष्ण की जीतको हार में बदल दिया गया. इस पर तो ये ही समझ में आता है कि पुराने काल में युद्ध भी लड़ा जाता था तो एक नियम से लड़ा जाता था, फिर तो ये खेल है. जिंदगी और मौत का खेल हो तो अपने को बचाने के लिए उसमे किसी स्तर तक गिरना समझ में आता है पर खेल में अपने को इस स्तर तक गिरा देना राष्ट्र की प्रतिष्ठा बचाता हो या ना बचाता हो पर वहा के प्रजा के मूल चरित्र को अवश्य दिखा देता है. भारतीय लोगो की एक बात ये है कि अभी इनमे अपने को ग्लोबल स्तर पे नियम के आड़ में अपने को नंगा करना नहीं आया है. शायद शर्लिन चोपड़ा या सनी लेओन ये कला हमको देर सबेर सिखा जाए. इस स्तर पे आ जाने पर किसी को भी हरा देना हमारे लिए आसान होगा. लेकिन ऐसी जीत के क्या मायने होंगे. इस जीत से तो हार ही बेहतर है.
अभी ये विवाद खत्म भी नहीं हुआ था कि ओलंपिक के 55 किलोग्राम कुश्ती मुकाबले में भारतीय पहलवान अमित कुमार की हार पर भारतीय खेमे से तीव्र प्रतिक्रिया हुई है और हार को हल्के में ना लेते हुए भारत की कुश्ती टीम के लीडर, राज सिंह ने रेफ्री के फैसलों के खिलाफ लिखित शिकायत दी है. यही नहीं खेल विशेषज्ञों ने भी अपनी नाराज़गी कड़े शब्दों में दर्ज करा दी है. सतपाल सिंह जो कि एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक विजेता रह चुके है ने बीबीसी से एक वार्ता में अपने विरोध को दर्ज कराते हुए कहा कि, “आज के मुकाबले देखकर मुझे ऐसा लगा जैसे कि ये रेफ्री ख़रीद लिए गए हैं, अब ये सब पेशेवर हो गए हैं, रेफ्री और जज के बिना आप अब नहीं जीत सकते… जो तीन प्वाइंट बुलगारिया के प्रतिद्वंदी को दिए वो दरअसल अमित के थे, वहीं से सारी कुश्ती बदल गई.”
अगर इतना कम नहीं था कालिख लगाने को इस ओलंपिक में तो दुनिया के सबसे तेज़ धावक जैमका के यूसेन बोल्ट के बयान ने वो कमी भी पूरी कर दी. ”कार्ल ल्यूइस मेरे मन में आपके लिए कोई सम्मान नहीं है. मुझे लगता हैं कि वो सिर्फ लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं, क्योंकि कोई भी उनके बारे में बात नहीं करता है” बोल्ट जो एक ही ओलंपिक में 100 और 200 मीटर के खिताब लगातार दो बार जीतने वाले एक मात्र खिलाडी बन गए है को आखिर कार्ल ल्यूइस, ओलंपिक खेलो में नौ स्वर्ण पदक विजेता, के खिलाफ आग उगलने की जरुरत क्यों आन पड़ी ? इसकी वजह है इस अमेरिकी धावक का कुछ वर्षो पहले दिया बयान कि ” जैमका जैसे देशों में रैंडम टेस्टिंग नहीं होती. महीनों तक उनके खिलाड़ियों की टेस्टिंग नहीं होती. मैं ये नहीं कहता कि कोई डोप कर रहा है, लेकिन सबको बराबरी का मौका मिलना चाहिए.” सो लिहाजा लन्दन में हुई प्रेस वार्ता में ये लाजवाब धावक अपना दर्द छुपा ना पाया.
बोल्ट के बयान का लन्दन ओलंपिक से सीधा नाता भले ना हो लेकिन इसकी टाइमिंग बहुत सही है क्योकि ये ओलंपिक में व्याप्त परदे के पीछे छुपे गणित को उभार देता है. ये स्पष्ट कर देता है कि बड़े देश छोटे देशों की जीत को किस तरह से लेते है. क्या इससें ये समझ में नहीं आता कि ऐसे देश अगर वश चले तो नतीजों को प्रभावित कर सकते है? भारत की बाक्सिंग और कुश्ती में हार को इसी परिपेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है.
यूसेन बोल्ट: कार्ल ल्यूइस मेरे मन में आपके लिए कोई सम्मान नहीं है
Reference:
BBC
BBC
विकास कृष्ण की जीत
योगेश्वर दत्त
Pic Credit:
Pic One
Pic Two
|
Email this Article
|
Add to reading list






