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Satya Ke Liye Ladne Walo Ko Duniyayi Label Ki Parvaah Nahi Karni Chahiye

Article By: Munna
Editorial and opinion



सच बोलने या सही बोलने वाले को दुनिया ने हमेशा तमाम तरीके की बौड़म उपाधियाँ दी है। सो लेबल की परवाह मुझे नहीं है। उस अवस्था से ऊपर उठ गया हूँ जहाँ लोगो को दुनियाई तमगो की चिंता होती है। कुछ तीव्रता से महसूस करना और फिर भी खामोश रह जाना एक प्रकार का बौद्धिक जुर्म है, बौद्धिक धोखा है। कम से कम ये मेरा तरीका नहीं है। स्त्रियों का मै सम्मान करता हूँ मगर इसका ये मतलब नहीं है कि उनके आचरण से जुड़े गलत तौर तरीको पर आपत्ति न उठाऊं। हर संवेदनशील व्यक्ति को समय रहते स्त्रियों को उनके आपत्तिज़नक आचरण के लिए सचेत करते रहना चाहिये इस बात की परवाह किये बिना कि इसका उन्हें खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है।


Submitted:Jan 30, 2013    Reads: 6    Comments: 1    Likes: 0   


सत्य जरूरी है ना कि लेबल

सत्य जरूरी है ना कि लेबल



सच बोलने या सही बोलने वाले को दुनिया ने हमेशा तमाम तरीके की बौड़म उपाधियाँ दी है। सो लेबल की परवाह मुझे नहीं है। उस अवस्था से ऊपर उठ गया  हूँ जहाँ लोगो को दुनियाई तमगो की चिंता होती है। कुछ तीव्रता से महसूस करना और फिर भी खामोश रह जाना एक प्रकार का बौद्धिक जुर्म है, बौद्धिक  धोखा है। कम से कम ये मेरा तरीका नहीं है। स्त्रियों का मै  सम्मान करता हूँ मगर इसका ये मतलब नहीं है कि उनके आचरण से जुड़े गलत तौर तरीको पर आपत्ति न उठाऊं। हर संवेदनशील व्यक्ति को समय रहते स्त्रियों को उनके आपत्तिज़नक आचरण के लिए सचेत करते रहना चाहिये इस बात की परवाह किये बिना कि इसका उन्हें खामियाज़ा भुगतना पड़  सकता है।  कम से कम ये बेहतर है इससें कि आप व्यर्थ के आंसू टपकायें कुछ गलत हो जाने के बाद उसी   गलत आचरण की वजह से। ये अलग बात है कि हम कदम तभी उठाते है जब सार्थक कदम अपनी अहमियत खो चुके होते है। अब ना तो मुझे इनकी तरह  आँसू बहाने का शौक है और ना ही मै इन निष्क्रिय आत्माओ  के समूह से में अपने आपको जोड़ सकता हूँ जो व्यर्थ ही आँसू बहाने के शौक़ीन है फोकट में।इसलिए तीव्रता से विरोध करता हूँ उस अवस्था से ही जब समस्या अपने प्रारम्भिक चरण में होती है। कम से कम विरोध करना तो मेरे हाथ में ही है। अगर आप मेरा साथ देते है तो अच्छी बात है। नहीं तो मै अकेले ही अपना विरोध तीव्रता से दर्ज करता रहूँगा। जिनको जो उपाधि मुझे देना है वो स्वतंत्र है मुझे देने के लिए। 

कभी कभी हमको चीजों को मानवीय दृष्टिकोण से भी समझना चाहिए, एक संवेदनशील दिमाग से भी देखना चाहिए। दिक्कत हमारे साथ ये है कि हम सब चीजों को ओवर इंटेलेक्चुअलआइज़ कर देते है। यही सबसे बड़ी समस्या है रेडिकल फेमिनिस्ट्स के साथ जो औरतो के अधिकारों के लिए लड़ रही है। अब औरतो के पास कुछ तथाकथित अपने पर्सनल अधिकार है पर जो चीज़ इस पर्सनल राइट्स के मिलने के बाद आयी कि पुरुषो के साथ परस्पर माधुर्य से जुड़े सम्बन्ध बनाने की काबिलियत का लोप हो गया। इसीलिए मुझे जो साधारण स्तर पर विचरणने वाले स्त्री पुरुष है वो ज्यादा जीवन का रस लेने वाले है बजाय दोहरी ज़िन्दगी, उलझाव भरी ज़िन्दगी जीने वाले ये अधिकारों की लडाई लड़ते स्त्री और पुरुष।

 

साधारण लोग जिंदगी को शायद बेहतर जीते है।

साधारण लोग जिंदगी को शायद बेहतर जीते है।


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(अपने अभिन्न मित्र घनश्याम दास, मेडिकल प्रैक्टिसनर है, यूनाइटेड अरब अमीरात, जी से कहे हुए शब्द एक विचार विमर्श के दौरान सोशल नेटवर्किंग साईट पर)

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