सिगरेट का कश लेते शैलेन्द्र अपने मीत राजकपूर के साथ!
फ़िल्म का चलना या ना चलना एक अलग मसला होता है. मूल बात ये थी कि फ़िल्म वास्तव में कैसी बनी थी. तो तीसरी कसम वाकई अच्छी बनी थी. लेकिन ये बात जरूर है कि इस फ़िल्म नेशैलेन्द्र को ये बता दिया कि फ़िल्म जगत उन जैसे सीधे अच्छे लोगो के लिए कभी नहीं बना था. इस फ़िल्म ने उनके करीब के लोगो के चेहरे से मुखौटे को हटा दिया. शैलेन्द्र के नजदीकी लोगो की बात पढ़िए आपको पता चलेगा कि किसी ने शैलेन्द्र के लिए मुफ्त काम नहीं किया. सब ने पैसे लिए. दूसरी बात मै इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि राजकपूर ने हीरामन के किरदार के साथ न्याय किया. वो इस वजह से कि राजकपूर जिस परिवेश में ढले थें, उनकी अरबन इंस्टिंकट्स (urban instincts) बहुत बड़ी बाधक थी इस किरदार की जरूरतों के साथ. ये शैलेन्द्र की सबसे बड़ी गलती थी राजकपूर को इस रोल के लिए चुनना.
ये अलग बात थी राजकपूर एक अच्छे अभिनेता थे. सो उन्होंने भरसक कोशिश कि अपना सर्वोत्तम देने कि लेकिन आप इतने बड़े मिसमैच को कैसे पाट सकते थे. सो आप ध्यान से देखे राजकपूर को इस फ़िल्म में आपको उनके अभिनय में नाटकीयता जरूर दिखेगी. तो मेरी नजरो में ये एक बड़ी गलती थी शैलेन्द्र कि जो राजकपूर को उन्होंने लिया. इस बात पे गौर करना आवश्यक है कि मुम्बईया सिने जगत में ग्रामीण जगत को या भारत के गाँवों को कभी भी यथार्थ स्वरूप में परदे पे लाने की कोशिश नहीं की गयी. सब में गाँव के नाम पर मसाला तत्त्व डाला गया. जैसा मिसमैच राजकपूर का तीसरी कसम में था वैसे ही नर्गिस का मदर इंडिया में था. ये अलग बात है दोनों अच्छे कलाकारों ने जान डाला अपने अभिनय से पर वास्तविकता से तो दूर ही था ना.
तीसरी कसम: भारतीय फ़िल्म इतिहास में मील का पत्थर
खैर बात तीसरी कसम की हो रही है. तीसरी कसम और साहब बीवी और गुलाम दोनों फिल्मे साहित्यिक कृतियों पर बनी है. तीसरी कसम फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी “मारे गए गुलफाम” और साहब बीवी और ग़ुलाम बिमल मित्र के इसी नाम के उपन्यास पर बनी थी. एक तो हमारे हिंदी फ़िल्म जगत पे साहित्यिक कृतियों पर फिल्मे बनाने का चलन नहीं और बनती भी है तो मूल कृति के साथ न्याय नहीं करती. सो दोनों फिल्मो का कृति के साथ लगभग पूरा सा न्याय करना बहुत संतोष प्रदान करते है. हा मेरे जैसे जाहिल जो मूल कृति को पढ़ कर फ़िल्म देखने की भूल कर बैठते है वो ये हमेशा जानते रहते है कि पढने में कृति के बहुत से पक्ष उभर कर आते है. परदे पर मामला बहुत सीमित हो जाता है. पर तीसरी कसम, गाइड, साहब बीवी और ग़ुलाम, परिणीता, काबुलीवाला कुछ एक ऐसी फिल्मे रही जिन्होंने मूल कृति के साथ बहुत अत्याचार नहीं किया.
चलते चलते शैलेन्द्र के बारे में कुछ कहना बहुत जरूरी है. शैलेन्द्र जैसा बेहतरीन इंसान फिल्मो की दुनिया में आने की गलती कर बैठा पर इनकी इसी गलती की वजह से हमे इतने अच्छे गीत सुनने को मिले. मेरे ये सबसे पसंदीदा गीतकार है और इनका कोई भी गीत चाहे वो “टूटे हुए ख्वाबो नें” या “दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई” या “तेरे मेरे सपने अब एक रंग है” आपको एक दूसरी दुनिया में ले जाता है. पर रूहानी ख़ूबसूरती से लैस इस बेहद नाजुक मिजाज इंसान को तीसरी कसम के बनने के दौरान पैदा हुई कडुवी सच्चाइयो ने आखिरकार इनको विशाल अजगर की तरह नील लिया. पैसा ही खुदा है या पैसा ही ईश्वर है इस दुनिया का इनके नाजुक ह्रदय पर गहरा आघात कर गया. फिर भी दुनिया शैलेन्द्र जैसे सुंदर आत्माओ की वजह से अस्तित्व में रहती है, दुनिया रहने के काबिल बनी रह पाती है. श्वेत श्याम सी जिंदगी में रंग भरने वाले शैलेन्द्र ( August 30, 1923 – December 14, 1966 ) को मेरी तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि.
References:
फणीश्वरनाथ रेणु
शैलेन्द्र
बिमल मित्र
शैलेन्द्र
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Pic One
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