श्रीलाल शुक्लजी: एक अनोखा साहित्यकार
पिछले कुछ एक महीनों से हम कुछ उन लोगो के निधन के बारे में सुन रहे है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अलग जगह बनाकर हमारे लिए जीने की राह सरल कर गए. स्टीव जाब्स, एप्पल के सह संस्थापक और अमेरिका के महानतम आविष्कारको में एक, जिन्होंने राजा परीक्षित की तरह मौत की निरर्थकता को साबित किया और ये साबित किया कि कम आयु कुछ अच्छा करने के राह में आड़े नहीं आती यदि गुणवत्ता आपकी आदत में शुमार हो तो. स्टीव जाब्स की तरह जगजीत सिंह भी हमको छोड़ कर चले गए. इतने शुरुवाती झटको के बाद भी इन्होने वही किया जो सोचा. सपने पूरे होते है यदि आप लगन से लगे है तो. जगजीत सिंह ने जिस तरह जिंदगी के मायने बताये अपने ग़ज़लों, गीतों और भजनों से वो उन्हें हमारे बीच स्थापित कर जाता है हमेशा के लिए.
इस तरह से श्रीलाल शुक्लजी भी थे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पढ़े हुए हमारे श्रीलालजी ने सरकारी नौकरी करते हुए भी सरकारी सत्ता के प्रति रुझान को नकारते हुए साहित्य साधना में अपने को रमा लिया. ये अच्छा ही हुआ कि उनकी पहचान एक लेखक के रूप में बनी वरना लोग अपने को सरकारी सेवक के रूप में पहचान स्थापित करना अपनी शान समझते है. ये हमारे यहाँ के लोगो को एक रोग लगा हुआ बबुआ सरकारी नौकरी करत हउवन !!!! जिसे देखो पूँछ उठाये सरकारी नौकरी का फार्म लेके घूमता रहता है. ये जो उनकी वितृष्णा उपजी सरकारी नौकरी में भ्रष्ट सिस्टम के बीच में रहकर इसने ही राग दरबारी को एक अमरत्व सा प्रदान किया साहित्य जगत में. इसलिए श्री लाल जी कहते है कि " राग दरबारी का व्यंग्य साधने के लिए मुझे कोई अतिरिक्त शब्द-साधना नहीं करनी पड़ी क्योंकि वह माहौल मेरा इतना जाना बूझा था कि वह सब कुछ सहज ही संभव हो गया।"
यद्यपि शुक्लजी ने "विश्रामपुर का संत", "अज्ञातवास", "सीमाए टूटती है", "मकान" जैसे बेहतरीन उपन्यास लिखे है, "अंगद के पाँव" और "अगली शताब्दी के शहर" जैसी व्यंग्य कृतिया लिखी है, "ये घर मेरा नहीं" और '"इस उम्र में" कहानी संग्रह लिखा है, "मेरा साक्षात्कार" जैसे संस्मरण लिखा है हम उन्हें जानते है राग दरबारी के लिए. इससें साबित यही होता है कि बहुत अच्छा लिखने के बाद भी कुछ एक ऐसी रचनाये बन पड़ती है जो हमारी पहचान बन के रह जाते है. शायद ये रचनामक जगत की पहचान है कि सब रचनाये समान रूप से अच्छी होने के बाद भी समान स्तर कि लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाती. वैसे शुक्लजी को सम्मान भी खूब मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार,पद्म भूषण और 2009 का भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान उनमे से प्रमुख है पर मुझे नहीं लगता कि उस आदमी कि जिसकी जीवन को समझने के लालसा तीव्र हो और जिसके अन्दर उम्र के अंतिम पड़ाव में भी यही सूझता हो कि " जीवन की जटिलताओं को साहित्य द्वारा अभिव्यक्त किए जाने को अभी बहुत कुछ शेष है" उसको इन सम्मान पत्रों से कोई ख़ास लगा रहा होगा.
बहरहाल ये अपने तरह का एक अनोखा साहित्यकार सबकी तरह एक नयी यात्रा करने को निकल गया पर हमारे लिए छोड़ गया जीवन को समझने के नए समीकरण.
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कुछ अंश उनकी कृतियों से :
चारों और फैली अव्यवस्था, बेकारी, गरीबी, निर्लज्ज भ्रष्टाचार यह सब देख रंगनाथ जब बहुत परेशान हो गया, दुखी हो गया तो उसने प्रिसिपल से कहा :- घिन आती हे मुझे इस व्यवस्था से, इन लोगों से. मैं कल ही गांव छोड़ चला जाऊंगा. तब प्रिसिपल उसे बोलता हे :- कहाँ जाओगे रंगनाथ जहाँ जाओगे वहीँ ये शिवपालगंज मिलेगा सारा हिंदुस्तान ही शिवपालगंज हे अरे यहाँ सभी चिडिमार हें तुम्ही तीसमारखां बनकर क्या उखाड लोगे.
सच ही तो है हिंदुस्तान एक रेल्वे स्टेशन का वेटिंग हाल हे अपनी-अपनी जगह बनाओ अखबार बिछाओ. हगो,मूतो,थूको अपनी गाड़ी पकड़ो और निकल लो अपने को कहाँ यहाँ दुबारा आना हे
[ सच हे किन्तु दुखद ]
.......कोई काम करना नही चाहता और करें भी क्यों अरे सरकारी नोकरी में भी आकर अगर काम करना पड़े तो लानत हे ऐसी जिंदगी पे इसीलिये समझदार लोग गम का घुंट पिके रह जाते हें उन्हें मालुम हे किसके पास जाओगे किसको शिकायत करोगे साला जिस किसी कि भी पूंछ उठाओगे मादा निकलेगा
(राग दरबारी)
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प्रिंसिपल ने आख़िरी धक्का दिया, “प्रधान कोई गबडू-घुसडू ही हो सकता है। भारी ओहदा है। पूरे गाँव की जायदाद का मालिक! चाहे तो सारे गाँव को 107 में चालान करके बन्द कर दे। बड़े-बड़े अफ़सर आकर उसके दरवाज़े बैठते हैं! जिसकी चुगली खा दे, उसका बैठना मुश्किल। काग़ज़ पर ज़रा-सी मोहर मार दी और जब चाहा, मनमाना तेल-शक्कर निकाल लिया। गाँव में उसके हुकुम के बिना कोई अपने घूरे पर कूड़ा तक नहीं डाल सकता। सब उससे सलाह लेकर चलते हैं। सबकी कुंजी उसके पास है। हर लावारिस का वही वारिस है। क्या समझे?”
( वह एक प्रेम पत्र था)
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यह सही है कि वैद्यजी को छोड़कर कालिज के गुटबन्दों में अभी अनुभव की कमी थी। उनमें परिपक्वता नहीं थी, पर प्रतिभा थी। उसका चमत्कार साल में एकाध बार जब फूटता, तो उसकी लहर शहर तक पहुचती। वहां कभी-कभी ऎसे दांव भी चले जाते जो बड़े-बड़े पैदायशी गुटबन्दों को भी हैरानी में डाल देते। पिछले साल रामाधीन ने वैद्यजी पर एक ऎसा ही दांव फ़ेका था। वह खाली गया, पर उसकी चर्चा दूर-दूर तक हुई। अखबारों में जिक्र आ गया। उससे एक गुटबन्द इतना प्रभावित हुआ कि वह शहर से कालिज तक सिर्फ़ दोनों गुटों की पीठ ठोकनें को दौड़ा चला आया। वह एक सीनियर गुटबन्द था और अक्सर राजधानी में रहता था। पिछले चालीस साल से वह अपने चौबीसों घण्टे केवल गुटबन्दी के नाम अर्पित किये हुए था। वह अखिल भारतीय स्तर का आदमी था और उसके बयान रोज अखबार में पहले पन्नों पर छपते थे, जिसमें देश-भक्ति और गुटबन्दी का अनोखा संगम होता था। उसके एक बार कालिज में आ चुकने के बाद लोगों को इत्मीनान हो गया था कि यहां अब कालिज भले ही खत्म हो जाय, गुटबन्दी खत्म नहीं होगी।
सवाल है: गुटबन्दी क्यों थी?
यह पूछना वैसा ही है जैसे पानी क्यों बरसता है? सत्य क्यों बोलना चाहिए? वस्तु क्या है और ईश्वर क्या हैं? वास्तव में यह एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक यानी लगभग दार्शानिक सवाल है। इसका जवाब जानने के लिए दर्शन-शास्त्र जानने की जरुरत है और दर्शन-शास्त्र जानने के लिए हिन्दी का कवि या कहानीकार होने की जरुरत है।
( क्या यही इन्सानियत है? )
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रंगनाथ ने कहा," वे दफ्तरवाले बड़े शरारती हैं। कैसी-कैसी गलतियाँ निकालते हैं।"
जैसे गाँधीजी अपनी प्रार्थना-सभा में समझा रहे हों कि हमें अंग्रेजों से घृणा नहीं करनी चाहिए, उसी वजह पर लंगड़ ने सिर हिलाकर कहा, "नहीं बापू, दफ्तरवाले तो अपना काम करते हैं। सारी गड़बड़ी अर्जीनवीस ने की है। विद्या का लोप हो रहा है। नये-नये अर्जीनवीस गलत-सलत लिख देते हैं।"
( कभी न उखड़ने वाला गवाह)
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किसी भी सामान्य शहराती की तरह उसकी भी आस्था थी कि शहर की दवा और देहात की हवा बराबर होती है। इसलिए वह यहां रहने के लिए चला आया था। किसी भी सामान्य मूर्ख की तरह उसने एम.ए करने के बाद तत्काल नौकरी न मिलने के कारण रिसर्च शुरु कर दी थी, पर किसी भी सामान्य बुद्धिमान की तरह वह जानता था कि रिसर्च करने के लिए विश्वविद्यालय में रहना और नित्यप्रति पुस्तकालय में बैठना जरुरी नहीं है। इसलिए उसने सोचा था कि कुछ दिन वह गांव मे रहकर आराम करेगा, तन्दुरुस्ती बनायेगा, अध्ययन करेगा, जरुरत पड़ने पर शहर जाकर किताबों की अदला-बदली कर आयेगा और वैद्यजी को हर स्टेज पर शिष्ट भाषा में यह कहने का मौका देगा कि काश ! हमारे नवयुवक निकम्मे न होते तो हम बुजुर्गो को ये जिम्मेदारियां न उठानी पड़तीं।
( पुरुष बली नहिं होत है)
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