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A Handful Of Grain

Poetry By: praveen gola
Literary fiction


Tags: Rising, Prices


Every day price is rising and common people are suffering a lot. India being agriculture based country is facing issue of depleting green fields.


Submitted:Feb 23, 2013    Reads: 8    Comments: 1    Likes: 1   


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Hindi poem on issue of price rise

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने ,
पहले ले जाता था जिन्हें इन्सां ,
झोले में भर कर अनजाने ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

आज उसका मूल्य है "सोना"…
दिन~ब ~दिन कीमत का रोना ,
दो रोटी खाने को भी अब ,
देखो पड़ गए कितने लाले ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

जिस "गेहूँ" को धरती उगले ,
उसकी वसूली का कर "सरकार" चुगले ,
जनता रह गयी भूखे पेट यहाँ पर ,
हज़म न हुए उसकी कीमत के माने ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

पहले गेहूँ और बाली ….
हो जाती थी खेतों से खाली ,
अब तो खेत वाला ही देखो ,
कुछ दानों के लिए देता गाली ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

बच्चे डरते अब खेत में जाते ,
पहले हर बाली में वो छिपते थे जाके ,
अब नहीं बचा वहाँ कोई खेल ही बाकी ,
हर बाली की कीमत क्योंकि अब आँकी जाती ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

पहले जलती थी "होली" में गेहूं और बाली ,
अब जलते सिर्फ अरमान ही खाली ,
क्या करे किसान बेचारा …..
त्यौहार पर कैसे कर दे अपने घर को खाली।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

क्या होगा भविष्य उन दानों का ….
जिन्हें मुट्ठी भी नसीब न होगी अब गिराने को ,
कृषि देश "भारत" को कैसे दिखाएँगे ,
उन तस्वीरों में ….जो हमारी "हरित क्रान्ति" दर्शाएंगे ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

शहरों में तो बन गया बहाना ,
चार रोटी के बदले अब दो ही खाना ,
कहते हैं की रोटी होती है मोटी ,
जिसको खाने से चर्बी जमा होती ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

पेट भरने का इसलिए ढूँढा ….अब एक नया विकल्प ,
मैदा से बने Pizza ,Burger …..हो रहे सफल ,
क्योंकि मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
सयाने बनकर हो गए अब बेगाने ।।





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