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An Unknown fear-Nasha

By: praveen gola

Page 1, This social Hindi poem appeals not to get addicted to bad habits. In this poem it is said that such addition destroys the family and create unknown fear.

एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
हर पल मुझे तिरस्कृत कर रहा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
क्या होगा जो तेरे पाँव के बिछ्वे को, वक़्त से पहले ही ऊँगली से जुदा होना पड़े ।

एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
कन्खिओं से मेरी ओर देख कुटिल हँसी हँसने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरी पायल की झंकार को, बजने से पीछे कोई करने लगे ।

एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
एक प्रश्नचिन्ह मेरी मुस्कुराहट पर रखने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरे हाथों की चूड़ी को ,तोड़ने पर मजबूर समाज करने लगे ।

एक अनजाना डर  मुँह बाए खड़ा …..
मेरे भोले-भाले मन पर कठोरता के व्यंग कसने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरे माथे की बिंदिया को, वक़्त से पहले कोई पोछने लगे ।

एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
मुझमें व्याभिचारिता का सबक भरने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरे कामुक  लम्हों को, कोई और पूरा करने लगे ।

एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
मेरी अंतरात्मा को पूरे जोर से झकझोरने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो इस माँग में भरे लाल सिन्दूर का रंग ,मातम के खून में बदलने लगे ।

सुनकर मैं  सिहर उठी ……
अपने अनचाहे भविष्य की टीस को सूनी आँखों से पढने लगी ,
जो कहना चाहता था…… वो अनजाना डर ,
उसके हर शब्द में ,अपने लिए की हुई हर एक “फ़िक्र ” को समझने लगी ।

“नशा ” करता है पुरुष रातों में ….
तकलीफ होती है उसके परिवार को ,जब साथ छूट जाए बीच राहों में ,
वक़्त उस वक़्त बहुत ज़ालिम सा हो जाता है ,
जब एक तरफ समाज और दूसरी तरफ परिवार का भविष्य नज़र आता है ।

स्त्री उस वक़्त भँवर में ऐसे गोते लगाती है ,
जहाँ पानी तो होता है पर नाव न नज़र आती है ,
वैधव्य की चिंता उसके कोमल मन को झकझोर जाती है ,
परन्तु पछतावा ही रह जाता है ,और चिड़िया खेत चुग जाती है  ।

वही अनजाना डर मुझे यूँ सचेत करने आया था ,
कि सँभल जाओ पहले ही ……..ये सन्देश देने आया था ,
रोक लो उन्हें “नशे” से गर शक्ति है तुम्हारे सीने में ,
वरना निरर्थक ये साथ है , कोई मज़ा नहीं ऐसे जीने में ।

अचानक मैं  भाग उठी इतने जोर से …. मानो समुद्र में तूफ़ान आया हो ,
उस अनजाने डर को भगाने …..”नशे” से लड़ने की तलवार लाया हो ,
क़दमों में उनके गिर पड़ी …..विनती करने की लगाकर गुहार ,
मत करो “नशा”….मत करो “नशा “…..सिर्फ एक बार सोच कर देखो ….मेरा उजड़ा हुआ संसार ।।

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