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Be Strong-Don't be Innocent

Poetry By: praveen gola
Literary fiction



This Hindi poem finds cause of sexual violence on women in our Indian society. Women who were once respected as goddess now are mistreated.


Submitted:Jan 3, 2013    Reads: 31    Comments: 0    Likes: 0   


sad-one-eye-woman

"वैश्या " गमन की चाहत में ,
लालायित है हर पुरुष प्रधान,
कोई कहे इसे सीख नयी ,
कोई कहे अमृत के सामान ।

देहव्यापार बना है अब तो ,
कर्मयोग की एक पहचान ,
कोई करे इसे रोज़ी की खातिर ,
कोई बढ़ाये स्टेटस में शान ।

पहले था जो "राजभोग" का भोजन ,
बन गया अब वो भोज एक आम ,
हर कीमत पर बिकती है अब ,
चलती रोड पर खुल~ए ~आम दुकान ।

बूढा हो या बाँका छोरा ,
मस्ती ले सब एक सामान ,
दिन भर की माथापच्ची का ,
ढूँढा ये एक नया आराम ।

"Call Gals " के दाम चढ़े जब ,
बढ़ गए उनके भाव तमाम ,
अच्छे घरों की भी खिल उठीं ,
इस कीचड़ में कमल सामान ।

आस हुई जब कामुकता की तो ,
फ़ोन किया ……खुले ~ए ~आम ,
क्यों शादी के बंधन बांधें ?
जब लत में लग जाएँ रोज़ नए ज़ाम ।

छपते रहते हैं रोज़ नए किस्से ,
कि "Raid "पड़ी वहाँ कल शाम ,
छोड़ दिया पैसों के बल पर ,
फिर से चकला चले नए नाम ।

पश्चिमी सभ्यता का है ये असर ,
जिसे अपना चुका अब हिन्दुस्तान ,
जिस कहानी में होती थी …पहले एक "देवी ",
उसको बना दिया अब एक बिकता सामान ।

क्यों वासना की चाहत होती,
युवा वर्ग को एक उम्र के बाद ?
सोचा होता जो पहले हमने ,
तो पा जाते इसका उत्तर भी आज ।

शादी कर रहे हैं युवा ,
संवार अपने "Career " को आज ,
परन्तु बहक रहे हैं पथ पर ,
कामुकता का ओढ़े ताज ।

खुले आम इन्टरनेट पर नग्न तसवीरें ,
उनके भोले ह्रदय को चीरें ,
ऐसे में वो कर बैठें नादानी ,
जिसकी कीमत पड़ती फिर उन्हें चुकानी ।

दोषी बन जाता जब मनुष्य ,
तब मुज़रिम करार करता साम्राज्य ,
पर कारण न कोई जाने इसका ,
कि क्यों है संकट में अर्थव्यवस्था ?

शादी हो गर सही समय पर ,
"नशे" के लिए न हो कहीं घर ,
अच्छी पुस्तकों में यदि ध्यान लग जाए ,
तो कैसे न कोई व्यभिचारिता से बच पाए ?

यदि व्यभिचारिता का हो जाए अकाल ,
अपनाने पर उसे किया जाए देश निकाल ,
तो अपने आप ही देह व्यापार बंद हो जाएँ ,
एक नए समाज की उत्पत्ति के कमल खिल जाएँ ।

देहव्यापार से नहीं चलती रोटी ,
न कोई इज्ज़त ही जग में होती ,
सिर्फ कुछ सालों के लिए क्यों हो बदनाम ?
अडिग रहो ……मत बनो नादान ।।





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