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Homage In Cities

By: praveen gola

Page 1, This Hindi poem is a black humour & offers diminishing importance of relations in fast lifestyle of cities. A black comedy revolves around condolence.

शहरों की भागती जिंदगी में ……सिर्फ वक़्त की कमी रहती है ,
रिश्तों के झूठे बंधन में ……….इनकी उम्र भी घटती रहती है ।

कल सुबह उठते ही …..खबर मुझे एक और मिली ,
कि “बुआ सास ” गुज़र गयी ……रिश्तेदारी निभाने की ज़िम्मेदारी सर पर पड़ी ।

यहाँ आँसू अब आते नहीं हैं …….अपने किसी के जाने के बाद ,
तो इतनी दूर के मेहमान को ……..कैसे करें अब रोकर याद ?

बस सामाजिकता के बोझ तले ………हर इंसान दब-दब कर मर रहा है ,
वरना तो किसी की मृत्यु होने पर ……..उसका अधूरा काम पहले लटक रहा है ।

जाना तो मुझे भी नहीं था …….किसी भी तरह की औपचारिकता निभाने ,
क्योंकि रिश्ते रह गए बस अब नाम के ……जिन्हें रखते हैं हम नाम गिनाने ।

खबर मिलने के अगले पल ही ….सारा माहौल फिर पहले जैसा ही हो गया ,
एक इंसान घर में से ………शोक व्यक्त करने के लिए चला गया ।

बाकी सब अपने-अपने ……… कामों में लग गए ,
और जिनके पास कोई काम नहीं …….वो चादर ओड़ बिस्तर में दुबक गए ।

ऐसे ही दिन बीत गया ………और रात के भोजन करने का समय आया ,
आज “डिनर” में ……..”आलू के परांठे ” खाने को जी ललचाया ।

लेकिन किसी की मृत्यु होने पर …….घरों में तले हुए पकवान बनाने की ….. होती है इजाज़त नहीं ,
शायद ये भी एक श्रधांजलि देने की ……….बड़े लोगों की हो एक “सीख” नई ।

मगर शहरों की जिंदगी में ……..सब कुछ बेमानी होता है ,
यहाँ “आलू के परांठों” के साथ ……..दही और चटनी का भी अच्छा प्रबंध होता है ।

घर में छक -छक कर ………सबने परांठों का मज़ा लिया ,
क्यूँ मारें अपने मन को …………जब किसी और के जीवन काल का समय पूरा हुआ ?

आख़िरी में बारी बची ……अब मेरे “डिनर” करने की ,
मैं सोच रही थी …….एक नयी तरकीब …….सबका दिल खुश करने की ।

बड़े ही प्यार से मैंने ……..अपने पराठें भी प्लेट में सजाये ,
और मक्खन की कटोरी साथ में रखकर ……..”डाइनिंग टेबल” के भाग जगाये ।

तीन परांठे खाने के बाद ………अचानक मुझे अपनी सेहत का ख्याल आया ,
कल ही “Dietician ” ने बोला था …..कि रात में “Fats” की न पड़ने देना …..अपने पर काली छाया ।

अब यही था सही समय …….एक तीर से दो निशाने करने का ,
अपनी सेहत की खातिर ……..किसी और के लिए शोक व्यक्त करने का ।

बड़े ही जोर से पुकार कर …….मैंने नौकर को आवाज़ लगाई ,
कि क्यूँ “मक्खन” दे दिया …….मेरे परांठे के लिए उसने भाई ?

क्या वो जानता नहीं ……   कि आज घर में शोक का माहौल है ,
इसलिए मेरे आख़िरी परांठे का ……बिना मक्खन के ही ……..श्रधांजलि देने में एक सबसे बड़ा “रोल” है ।।

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