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Love of Mother-Unconditional

Poetry By: praveen gola
Literary fiction



Collection of Hindi poems on mother's love. Today when heart is crying for mother there is still feeling of her touch in tears. Mother is always in heart.


Submitted:Dec 6, 2012    Reads: 14    Comments: 0    Likes: 0   


Love of Mother- A Collection of Six Hindi Poems

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Love of Mother- Six Hindi Poems

1. कर्मों का लेखा-जोखा

आज मत रोको मुझे ….मुझे जी भर के रोने दो ,
इस जलती हुई लकड़ी को, धीरे-धीरे से ठंडा होने दो ।

बहुत प्यासा हूँ मैं …..बड़ी दूर से चलकर आया हूँ ,
इस लहरों भरे समुन्दर में, कश्ती खेमे की तलब लाया हूँ ।

जंगल में आग लगी ……मैं बेचैन सा “माँ ” को ढूंढ रहा ,
शायद उसके आँचल में छिपकर, मैं  मौत से लड़ने को झूझ रहा ।

“माँ” मेरा व्यथित ह्रदय …..तुझको यूँ पुकार रहा ,
क्यों इन आँसू की धारों में भी, तेरे हाथों का स्पर्श उभार रहा ।

बहुत भूल हुई मुझसे …….जो मैंने तेरा तिरस्कार किया ,
इस जनम में ही नहीं, हर जनम में भोगूँ ऐसा पाप किया ।

मैं अभागा इस धरती पर ……अपनी ब्याहता की जुबानी का मोहताज़ हुआ ,
तुझे उस घड़ी उस पल में अकेला छोड़ ,अपने नए आशियाँ को सजाने को अपराध हुआ ।

तूने सोचा तो होगा ……उस आखिरी घड़ी  में मुझको ,
क्योंकि हिचकी ही नहीं रुक रही थी ,कल रात से मुझको ।

मेरा कठोर ह्रदय ……क्यों भूल गया वो तेरी कोख ?
जहाँ उथल-पथल मचाने पर भी , हँसी  से तू हो जाती थी लोट-पोट ।

“माँ” मैं अभागा बड़ा …..अपनी हर सोच पे रोने आया हूँ ,
इस जलती हुई लकड़ी में ,अपने कर्मों का लेखा-जोखा पढने आया हूँ।।

 

2. मदर डे

आज दिन है बड़ा सुहाना ,
आज मनायेगा मदर डे ज़माना ।
अच्छा हुआ अंग्रेज़ों से कुछ तो हमको नयी चीज़ मिली ,
“माँ” को आदर देने की ये छोटी सी एक सीख मिली ।

364 दिन हमारे गुज़रे अपनी खुशियों के लिए ,
1 दिन रख छोड़ा हमने अपनी “माँ” से लिपटने के लिए ।
रूपये -पैसे का नहीं उसको कोई लोभ ,
“माँ” शब्द ही उसको लगा दे संतान का “प्रेमरोग” ।

“माँ “, “मदर “, “जननी ” ,”माता “,
कुछ भी कहो उसको सब भाता ।
नाम चले सदा पिता का …..जब भी हम ऊँचाई पर पहुंचे ,
बस कोख में उसके जनम लिया ……..इतना सा ही एक पल को सोचें ।

सबका क़र्ज़ उतार के जब हम …..जीवन से निवृत हुए ,
“माँ” का फ़र्ज़ भूल गए तब ….. अपनी मदिरा में चूर हुए ।
“माँ” तुझे उस मदिरा की सौगंध , तेरे लिए ये दिन बनाया है ….
“मदर डे” को नमन है मेरा , जिसने “माँ ” के लिए …. मेरे ह्रदय में प्रेम जगाया है ।

 

3. अठाराह के पार

सबके लंच में आलू-पूरी ,
मेरी अभिलाषा रही अधूरी,
“माँ ” मेरी मुझको छोड़ के चल दी ,
पर दिल से न मिटा सकी कोई दूरी ।

रोज़ विधालय के द्वार के आगे ,
मुझे देखने की आस में भागे ,
मैं कन्खिओं से उसे निहारूँ ,
“माँ” है मेरी ऐसा सोच कर पुकारूँ ।

कसूर उसका कहूँ या पिता का,
बस भाग्य ही जान सकता है सच उसका ,
दूसरी औरत की खातिर पिता ने उसे छोड़ा,
पर उसने मुझसे फिर भी न मुहँ मोड़ा ।

इतनी स्नेह्मई ,इतनी प्यारी….
पर बेचारी किस्मत की मारी,
मेरे लिए पल-पल तड़पती ,
मोटे-मोटे आंसू पलकों पर रखती ।

“माँ” तू फ़िक्र बिलकुल न करना ,
अठाराह का होने में चार वर्ष का बचा है …. बस छोटा सा सपना ,
अदालत से कंहूगा जाकर इस बार …..
कि  ”माँ “मत छीनो किसी की, जब तक वो न हो अठाराह के पार ।।

 

4.  मेरी “सखा”

“माँ” का एक रूप ऐसा है ,
जिसे समझने में कई साल लगे ,
पर जब समझा उस रूप को मैंने ,
तब सब रिश्ते बेकार लगे ।

“माँ” एक ऐसी सखा बनी मेरी ,
जिसका न मैंने कभी ध्यान किया ,
पर  “माँ ” ने थामकर हाथ मेरा ,
मेरा इस जग में ऊँचा नाम किया ।

बचपन में जब सखियाँ मेरी ,
मुझसे लड़कर चली जाती थीं ,
तब “माँ” मेरी धीरे-धीरे से ,
मेरी सखी बनकर खेलने आती थी ।

दिन यौवन के जब चार हुए ,
“माँ” के शब्दों से बाग़-बाग़ हुए ,
एक “सखी: बनकर उसने ज्ञान दिया ,
समाज में जीने का स्वाभिमान दिया ।

ऐसी सखा,ऐसी मित्र ,ऐसी दोस्त ,
ढूँढने पर भी न मिलेगी कभी,
जो अपनी संतान की खातिर ,
रूप बदलने की छठा बिखेरती रही ।

समय रूपी पहिये के साथ ,
न जाने कितने मित्र जीवन में आये ,
पर अंतिम समय तक मित्र बनकर ,
‘माँ” एक तूने ही मेरे सपने सजाये ।

आज अकेली में खड़ी होकर ,
जब तेरा वो प्यारा रूप याद करती हूँ ,
तब आंसू की बहती धारों के साथ ,
“माँ” तुझे शत-शत प्रणाम करती हूँ।

 

5.  सिर्फ तुम्हारे लिए

आज भी धडकता है ये दिल ,
“माँ ” तेरी हर साँस  के साथ ,
कौन कहता है कि में अंश नहीं अब तेरा?
चलता हूँ अकेले में थाम कर तेरा हाथ ।

लोग हँसते हैं कि अब हो गया मेरा भी ब्याह ,
फिर क्यों ढूँढने लगा मैं भीड़ में अपनी “माँ” ,
लेकिन “माँ” तो आज भी “माँ ‘ रहेगी ,
कैसे रोक दूँ भला नए रिश्ते की खातिर अपनी जुबां ?

तेरा रिश्ता किसी सोच का मोहताज़ नहीं,
तू आगाज़ है कोई अंदाज़ नहीं ,
किस्से मोहब्बत के अक्सर सुने बहुत ,
पर मोहब्बत~ए ~माँ  के लिए कोई अलफ़ाज़ नहीं ।

माँ-बेटे के रिश्ते को गर समझ सका कोई इस जहाँ में ,
तो वो एकलौता एक मैं नादान हूँ ,
माना कि छुपा रखा है सीने में एक छोटा सा कोना तुम्हारे लिए ,
पर उस कोने को कोई नाम देने में मैं अनजान हूँ ।

बस “माँ” सौंपता हूँ तुझे अपना ये तन-मन सदा के लिए ,
मेरे शब्दों की चाहत और पवित्रता का सम्मान तुम्हारे लिए ,
क्योंकि आज भी धडकता है ये दिल ,”माँ” तेरी हर सांस के साथ ,
सिर्फ तुम्हारे लिए ………. हाँ,  तुम्हारे लिए ।।

 

6. “माँ” की छाया

सबने खोजा मेरे अवगुण को ,
एक “माँ” तूने उसे नया रूप दिया |

सबने पुकारा मुझे “नेत्रहीन “जग में ,
एक “माँ” तूने अपने नैनो का प्रकाश दिया ।

मैं  अँधा खोज रहा अपने जीवन की डगरिया को ,
तूने थाम हाथ मुझे सिखा दिया ,पार करना इस भूल-भुलैया को |

‘माँ” तेरा ह्रदय विशाल बड़ा, छुप -छुप कर किस्मत पर रोती रही,
पर मेरा अवगुण छिपाने में ,तू अपनी सुध-बुध खोती  रही ।

गर “माँ” में ऐसा दोष होता तो बेटा  बड़ा होकर कहीं चला जाता ,
लेकिन तूने जाने की कभी न सोची,क्योंकि तू कहलाती है “जननी ” और  ”माता “।

आज लायक हुआ तेरा बेटा अपने पाँव पर खड़ा होकर ,
बस अब तो मुझे पड़ने दे अपने पाँव में ,पा  सकूँ तेरा आशीर्वाद चरण स्पर्शकर ।

माँगू यही भगवान् से कि नेत्रहीन बनाये जो अगले जनम में मुझे ,
तो “माँ” की छाया देनी न भूले ,जो हर “नेत्र ” से छूले मुझे ।।





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