Welcome Visitor: Login to the siteJoin the site


Tags: Party


Hindi poem describes 'Men's Party' in which all the guests enjoy their drink and each other's company but they don't care about house-lady emotions.


Submitted:Apr 12, 2013    Reads: 5    Comments: 0    Likes: 0   


two-drinks

मत जाओ वहाँ …..वो "मर्दों की महफ़िल" है ,
मत झाँको वहाँ ….वो "मर्दों की महफ़िल" है ।
"मर्दों की महफ़िल"…….ये महफ़िल कैसी होती है ?
क्यूँ ना जाऊँ वहाँ मैं …..वो जो "मर्दों की महफ़िल" है?

अपने अंतर्मन के सवालों को खोजने …….मैं तकने लगी ,
उस कमरे को …..हाँ वही …..जहाँ वो "मर्दों की महफ़िल" थी ।
कमरे के अन्दर से आ रही थी ……ठठहाकों की आवाज़ ,
जहाँ जाम से जाम टकरा रहे थे …….जैसे छेड़े हों किसी ने नए साज़ ।

जहाँ औरतों के जाने की मनाई थी ,
क्योंकि वहाँ सिर्फ नशे की परछाई थी ।
और उस "मर्दों की महफ़िल" के बिना …..
पार्टी के जश्न में ….. अब तक रौनक भी ना छाई थी ।

मैं बहुत देर तक ….परदे के पीछे से ,
तकती रही उस "मर्दों की महफ़िल" को ,
अनोखी सी दोस्ती होती थी जहाँ …..
दो अनजानों में …..नशे के घूँट पीने को ।

हर जाम के साथ ….दोस्ती गहराती जाती थी ,
और धीरे-धीरे बोतल खाली होने पर ……अपनी औकात दिखाती जाती थी ।
जो अभी कुछ देर पहले ….मित्र हुआ करते थे ,
वो अब सबसे ज्यादा पीने वाले की …..Hate List में बसा करते थे ।

धीरे-धीरे उस "मर्दों की महफ़िल" का …..Wind Up होने लगा ,
हर कोई बहका-बहका सा …..अपने जलते हुए अरमानो को भिगोने लगा ।
मैं दूर कहीं जाकर …….एक कोने में दुबक गयी ,
उस "मर्दों की महफ़िल" के ……नए नाम में भटक गयी ।

हाँ वो "मर्दों की महफ़िल" थी ….
जिसमे जाने की मुझे मनाई थी ,
हाँ वो "मर्दों की महफ़िल" थी ….
जहां औरतों के बिन मस्ती छाई थी ।

हाँ वो "मर्दों की महफ़िल" थी ….
जिसका समाज में एक सम्मान था ,
हाँ वो "मर्दों की महफ़िल" थी ….
जहाँ जाने पर औरत का नाम बदनाम था ।

मैं अकेली छत पर खड़ी हो …
एकटक आकाश को निहारने लगी ,
उस खुले आसमान में फैले ….
हर सितारे पर नज़र मारने लगी ।

सोचा कि क्या यहाँ भी ऐसी ही ….
कोई "सितारों की महफ़िल" है ?
जहां जश्न मनाने के लिए …..
किसी के मरते हुए …..अरमानो की बलि है ।

मन मारकर मैंने अपनी …..
खाने की प्लेट सजाई ,
और अपने "मर्द" के बिना ही …..
हर पकवान के स्वाद की …बेस्वादी की कीमत चुकाई ।

कसूर मेरा नहीं था …..
कसूर उस "महफ़िल" का था जनाब ,
जहाँ "मर्दों की महफ़िल" सजाकर …..अपनी अर्धांगनी को ,
तन्हा छोड़ दिया जाता था …..महफ़िल के Compound में …..बनाकर शबाब ॥





0

| Email this story Email this Poetry | Add to reading list



Reviews

About | News | Contact | Your Account | TheNextBigWriter | Self Publishing | Advertise

© 2013 TheNextBigWriter, LLC. All Rights Reserved. Terms under which this service is provided to you. Privacy Policy.