Save on all your Printing Needs at 4inkjets.com!

Meri Pehchaan

By: praveen gola

Page 1, This Hindi poem on identity states not to lose the originality of oneself. One\'s thought is one\'s identity. Always strive to keep your identity alive.

हर रोज़ मेरी “पहचान” ….कहीं लुप्त हो जाती है ,
मैं एक “लेख” लिखती हूँ ……
और अगले दिन न जाने ….
कितने नए लेखों की ,एक परत उस पर जम जाती है ।

मैं रोज़ इसी उधेड़ -बुन में ….
अपनी “पहचान” की अभिलाषा से …..
फिर से कदम बढ़ाती हूँ ……..
जिंदगी की रेस में ….बस भागती ही जाती हूँ ।

ये सोच कर कि ……आज गिर गए तो क्या हुआ ?
कल फिर से उठेगा …..धीरे-धीरे से धुआँ ,
आग लग गयी मेरे “आशियाने” में आज ……ये सोचकर ,
मैं उस आग को बुझाने की ……नयी तरकीब लगाती हूँ ।

जिस दिन मैंने …..अपनी “नयी सोच” को … न हवा दी ,
उस दिन मेरी सोच ने ही ……मुझको ऐसी सज़ा दी ,
मैं अपनी सोच पर पड़ी …..हर गर्त को हटाती हूँ ,
कि वो मेरी “पहचान” थी …..जिसे मैं गले लगाती हूँ ।

हम जीते हैं तो सिर्फ …. एक “पहचान ” के लिए ,
एक नाम के लिए …एक शान के लिए ,
रोज़ रेत में दबते हैं ……ऊँचाइयों को छूने की खातिर ,
फिर उसी रेत से खोजते हैं …….क़दमों के निशान ……बनके शातिर ।

इसलिए अपनी “पहचान ” को …..कभी खोने न देना ,
दब-दब के विचारों में भी ……..उसे सोने न देना ,
इतिहास गवाह है – हर उन “पहचान” बनाने वालो का ,
जिनके चेहरे से …. ज्यादा दीवाने हैं   ….”जिन्दा ख्याल “……उन मतवालों का ।

ऊँची सोच …..ऊँचे विचार ……जब भी हम मन में लाएँगे ,
लाख कोशिशों के बाद भी ……दबने यूँ न पाएँगे ,
“संघर्ष” करने की ललक ……जब तक तन में जिंदा रहेगी ,
तब तक आने वाली पीढ़ी से ……ये पुरानी पीढ़ी लड़ती रहेगी ।

मुझे भी रोज़ लड़-लड़ कर ….अपनी “एक पहचान” बनानी है ,
अपने लिखे “लेख” को … दबने से पहले ही …उस पर एक और नए “लेख” की परत चढ़ानी है ,
जब तक मेरी पहचान को ….पहचानने वाला न कोई आएगा ,
तब तक मेरे हर “लेख” से ……मेरे नाम का Copyright बनता जाएगा ।।

A Message To All-

Never Lose “Yourself”…….As Every New soul has its own Role.

© Copyright 2014praveen gola All rights reserved. praveen gola has granted theNextBigWriter, LLC non-exclusive rights to display this work on Booksie.com.

© 2014 Booksie | All rights reserved.