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Rape Of A Navraatra Devotee

Poetry By: praveen gola
Literary fiction


Tags: Social, And, Moral


In India, on one hand girls are worshipped as symbol of power, goddess Durga, On other hand even young girls are raped in the same society.


Submitted:Apr 26, 2013    Reads: 26    Comments: 0    Likes: 0   


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फिर से नवरात्रों की धूम मची ….
लो फिर से है दुर्गा अष्टमी आई ,
गली-गली, गाँव-गाँव के घरों में ….
बुला कन्याएँ …..कंचक जिमाई ।

फिर से आया एक बुरी आत्मा का साया …..
लो फिर से है एक ठरकी का जी ललचाया ,
गली-गली , गाँव-गाँव घूम कर उसने ….
एक मासूम कन्या को आखिर फुसलाया ।

एक ओर भोली-भाली सी कन्याएँ ,
हाथों में कलावा पहने पंगत में आएँ ,
चरणों को धोकर उनके जब तिलक लगाएँ ,
तो साक्षात देवी माँ के दर्शन हो जाएँ ।

दूजी ओर बंद कमरे में एक मासूम कन्या ,
धीरे-धीरे चख रही विष की दुनिया ,
वहशियों के घिनोने इरादों को ….
जब तक समझी तब तक लुट गई उसकी दुनिया ।

एक ओर हलवा-पूरी का भोग लगा ….
नन्ही-नन्ही कन्यायों को कर दिया विदा ,
ठुमक-ठुमक कर हाथों में प्लेट को थामे ,
दुर्गा-अष्टमी के दिन वो धरतीं रूप सयाने ।

दूजी ओर बस कन्या दिखती भोग की वस्तु ,
भोग-भोग कर उसको कर दिया लाचार परस्तु ,
इतनी हैवानियत से उसको रौंदा ….
कि हर सुनने वाले का खून है खौला ।

एक ओर कन्यायों में देवी रूप है जागा ,
दूजी ओर वही रूप कलुषित हो ऐसे भागा ,
एक ओर कन्यायों की है ढूँढ मची ….
दूजी ओर कन्यायों को करने चले दफन यहीं ।

एक ओर कन्याओं पर सौ-सौ नोट लुटाएँ ,
दूजी ओर कन्यायों की अस्मत लेने के लिए औज़ार घुसाएँ ,
एक ओर तिलक लगा माथे पर है लाली सजी ,
दूजी ओर वही लाली देखो खून बनकर बही ।

ये कैसी विडम्बना हो रही है कलयुग में ?
जहाँ कन्या को स्त्री समझ भोग रहे ,
क्यूँ "दुर्गा " अब आती नहीं है नष्ट करने ….
मधु-कैटभ को जो सेवन अब कन्या का करें ?

बदल नहीं सकती मानसिकता गर पुरुषों की ,
तो क्यूँ हम पैदा करें …..सोचो कन्याएँ ?
क्या नहीं होगा अच्छा ये …..सोचकर तो देखो ,
जब रह जाएँ सिर्फ यहाँ "मर्दों' के साए ।

तब भोग कर वो एक -दूजे को यूँ घंटों ,
तृप्त करके रच देंगे वो ऐसी घटनाएँ ,
जिन्हे पढ़कर आनेवाले युग में सोचेंगे सब ,
कि क्यूँ थी कलयुग में ऐसी वीभत्स रेखाएँ ?

मत कहो कन्यायों को देवी का स्वरुप ,
मत कहो कन्यायों को एक नया प्रतिरूप ,
जब तलक ये वहशियाना कदम बढ़ेंगे ,
तब तक ये जिस्म~ओ~ जान यूँ ही तपते रहेंगे ।

गर मनाना चाहते हो "देवी" के नवरात्रे ,
तो पहले स्त्री की अस्मत बचाने की लौ जलाओ ,
और जब वो ज्वाला जलकर अपना प्रकाश फैलाए ,
तब उस प्रकाश में अपनी मानसिकता को नहलायो ।

हाँ हम भक्त हैं ….उस "दुर्गा" माँ के ,
जिसको पूजने की खातिर रखते हैं व्रत इतने ,
अब या तो अस्मत को नहीं ….लुटने हम देंगे ….
या फिर अगले नवरात्रे …. व्रत में देवी को "नग्न" पूजेंगे ।

है गर हिम्मत …हम सब में बोलो इतनी ,
तो ख़त्म ये अस्मत का खेल करना पड़ेगा ,
आज नहीं ….कल नहीं ….बस सोच लो ये ,
कि अबला नारी के तन को …फिर से ढकना पडेगा ।

मत फुसलायो बच्चियों को …..करने को बलात्कार ,
मर्द की औलाद हो तो …..खर्चो नोट बेशुमार ,
है गर हिम्मत जो तुममे ….तो शौक पूरे अपने करो ,
वैशाल्यों में जाकर के अपनी ….हवस को तुम ठंडा करो ।

शर्म से धरती गड़ी और शर्म से अम्बर गड़ा ,
जब नाम तुमने अपना देखो …..इस तरह कलंकित किया ,
आज गर जवानी है तो …..कल ये भी बुढ़ापा बनेगी ,
गर आज तुम लूटोगे अस्मत ….तो कल तुम्हारी भी अस्मत यूँही लुटेगी ।

इसलिए याद रखो ……"देवी" की ये अराधना ,
"कन्या" ही वो रूप है …..जिसकी शक्ति के आगे …न हो कोई कामना ,
पूजा ,अर्चना तुम करो …..उस "कन्या" रुपी रूप को ,
ख्यालों में भी मत लाना कभी …..ऐसे विचार ……जो रौंद दे उस "फूल" को ॥

A Message To All-

Girl Child Rape Is A Heinous Crime……Which Makes The Criminal Bas*ard………More Than Hundred Times.





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