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tere shahar ko

Poetry By: milap singh
Other


Nil


Submitted:Nov 18, 2012    Reads: 7    Comments: 0    Likes: 0   


तेरे नाम की हर शय से मैंने िरश्ता तोड िलया

याद न आए तू मुझको तेरे शहर को छोड िदया

संग के िदल में जब जरा भी उल्लफत न जागी

पत्थर के पहाडो से टकरा के हवा ने रुख मोड िलया

यह न सोचो ' िमलाप ' तुम्हारी शामोसहर कहाँ गुजरेगी

शहर के इक सज्जन ने मयखाना नया खोल िलया

िजंदगी की राह पे चलते तूने नहीं कोई लापरवाही की

गम ओर इश्क भला िकसने इस दुिनया में मोल िलया





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