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garibi mere hindustan se

Poetry By: milap singh
Poetry


poem by milap singh bharmouri


Submitted:Apr 8, 2013    Reads: 24    Comments: 0    Likes: 0   


अगर नामुमकिन नही है कुछ भी

इस जहान में

तो मिटती क्यों नही गरीबी मेरे

हिंदुस्तान से

इन झुगियों से जैसे कोई वास्ता नही है

इस चश्मे - पुरआव की कोई दास्ताँ नही है

बस निकल लेते है काफिले इधर से

अनजान से

नेमते -खुल्द -में वो जिए जा रहे है

सियासतों पे सियासत किए जा रहे है

देखें तो इक झलक इधर भी वो

सब्र -ओ -ताव से

....milap singh bharmouri

चश्मे - पुरआव -- आंसुओं से भरी आँख , नेमते -खुल्द -- स्वर्ग जैसा सुख , सब्र -ओ -ताव -- सहास से





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