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ya vo anpadh hai

Poetry By: milap singh
Poetry


poem by milap singh bharmouri


Submitted:Mar 30, 2013    Reads: 0    Comments: 0    Likes: 0   


या मै अनपढ़ हूँ

इसलिए मुझे बात समझ नही आती

या वो बडबोला है

बस वह बोलने का ही है आदि

वो कहता है यहाँ पर

हर आदमी समान है

मै कहता हूँ के वह

इस दुनिया से ही अनजान है

या वो अनजान है

या अनजानेपन का ढोंग करता है

या मानसिकता कलुषित है

या उसके मन में

कोई रोग पलता है

क्या वो अँधा है

रोज उसे अपने महल से निकलते

रास्ते में मेरी झुग्गी दिखाई नही देती

क्या वो बहरा है

उसे मेरे भूखे बच्चे की

रोने की आवाज सुनाई नही देती

वो अक्क्सर कहता है

कभी अखवारों में

कभी टी. वी. पे

कभी भूखों की भीड़ में

इन्ही बाजारों में

कि यहाँ पर सब इन्सान बराबर है

मिलाप सिंह भरमौरी





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