ग़म न गिन इस तरह कहीं शाम न हो जाए !
शिकवे छुपा ले ज़ारा मोहब्बत आम न हो जाए !
तेरी गली से इस लिये गुज़रता नहीं जाने जिगर
गली का पत्थर बेवजह कोई तेरे नाम न हो जाए !
हँसके न देख उस तरफ़ ओ बेपरवाह ओ बेरहम
यारों की महफिल में कहीं क़त्लेआम न हो जाए !
जनाब, मेरे दुश्मन-ए- खास, इतना न सोचें मुझे
अपनों में मेरे कहीं आपका नाम बदनाम न हो जाए !
---सबा हिलाल
|
Email this Poetry
|
Add to reading list





