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From the upcoming book--- Valentine Ghazals - Series 2

Poetry By: Saba Hilal
Poetry


New Verses in Hindi


Submitted:Feb 2, 2012    Reads: 12    Comments: 0    Likes: 0   


ग़म न गिन इस तरह कहीं शाम न हो जाए !

शिकवे छुपा ले ज़ारा मोहब्बत आम न हो जाए !

तेरी गली से इस लिये गुज़रता नहीं जाने जिगर

गली का पत्थर बेवजह कोई तेरे नाम न हो जाए !

हँसके न देख उस तरफ़ ओ बेपरवाह ओ बेरहम

यारों की महफिल में कहीं क़त्लेआम न हो जाए !

जनाब, मेरे दुश्मन-ए- खास, इतना न सोचें मुझे

अपनों में मेरे कहीं आपका नाम बदनाम न हो जाए !

---सबा हिलाल





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