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jeevan mela

Poetry By: tamannaah
Poetry


the art of living


Submitted:Jan 16, 2014    Reads: 3    Comments: 0    Likes: 0   


हमारे जनाज़े में कहकहे लगाने वालों,
मेरी इस महफ़िल कि सोभा बढ़ाने वालों,
लिबास तले ना अपनी नियत छुपाने वालों,
तेरा सुक्रिया मेरी आखिरी मुजाजसमें में आने वालों!!
तेरी तरह हम भी कई ऐसी महफ़िलों में गये,
सच सौ परतों में चुापए थे सभी में ,
बदसूरत नज़रों को सुर्मे से सजाया - छुपाया,
मंद मन में मुस्कुराए, आँसू पर कोनों से छलकाया ,
भीर का बन हिस्सा उनके सुर से सुर मिलाया'!!
बदस्तूर दोहरा रूप लिए हमने दोतहों में ज़िन्दगी बिताया,
तुमने कमसे कम इस रिवाज़ इस रिवायत को झुण्ठलाया,
ना मुस्कुराये तुम दिखाने को,
ना अपनी नमी छुपाई गम को खुशी बताने को,
ना दुनिया को लगा चहरे पे झूठे रंग भरमाया,
साथी न हों बहौत तेरे, पर तूने अपना साथ बखूबी निभाया,
ज़िन्दगी में -- ज़ीने का तूने सही ढंग अपनाया,
हमसे थोड़ी देर हो गई पहुँचने में,
हम समझे तरीका जीने का अपने रूख्सती के मेले में !!




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