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Jeevansaar

Poetry By: tamannaah
Poetry


a quest to understand life and its path


Submitted:Jan 16, 2014    Reads: 9    Comments: 0    Likes: 0   


जीवनसार

अनजान राहों को तरास्ते, हम बढ़ चले प्रीत की राहों पर
दो राहे पे ठहरे हैं कदम, आज और कल मैं बोझील सांझ
किस ओर जाएं, किसको समझाएँ,
हमराही के साथ को, अंबर कोई कैसे छोर जाए
दोनों हैं एक दिल के हिस्से, एक बिन कैसे काम चलाएँ
दो कल के बीच कुछ क़दमों की दुरी है
जीवन का पहिया- पैसों, समाज, जाति पर करती धुरी है
सब कहते हैं लाखों से खुशियाँ आती है
हम समझे बैठे थे दिल से इसका नाता है
बलिदान बरपन कैह्लाता है, नातों मैं त्याग पहले आता है
इन सब मैं खुशियाँ, प्यार, तृप्ति - स्तित्वा का सार कहीं गूम जाता है
माने या ना माने इंसान, चार पल के जीवन मैं ये हिं सबसे पहले आता है





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