साहिर: मेरे पसंदीदा गीतकार
साहिर मेरे पसंदीदा गीतकार रहे है क्योकि उनके गीतों में कोरा आदर्शवाद नहीं था और ना ही उनमे भटकाव भरी रूमानियत थी . भजन भी उनके कलम से निकलता था तो ऐसा लगता था कि जिंदगी को ही सच मानने वाले ने परम सत्ता से कैसे सम्बन्ध बना लिया ? कहने का मतलब उनके अनुभव का दायरा विशाल था और इस बात को समझना लगभग नामुमकिन है कि कैसे वे विपरीत छोरो पर विचरण कर लेते थे एक वक्त में ही.
अब ये गीत ही देखिये. भारतीय दर्शन की एक जबरदस्त झलक दिखती है इस गीत में. एक प्रोग्रेसिव शायर की कलम से निकला है ये दार्शनिक गीत. है ना ये अजूबा!! ये गीत मुझे बहुत रूहानी सुकून देता है. सच में ये जीवन एक साबुन का बुलबुला है कब ये फूट जाए कोई नहीं कह सकता. कब हम अनंत की यात्रा में निकल जाए इस माया को छोड़कर जिससे हम चिपके रहते है कोई कह नहीं सकता. इसी अनंत की रहस्यमय यात्रा की तरफ इशारा करता है साहिर का ये गीत. ये तो सब जानते है कि इसी अनंत की यात्रा की कहानी है हमारा भारतीय दर्शन.
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संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है
आडिओ संस्करण: http://smashits.com/dhund/sansar-ki-har-shae/song-72665.html
Pic credit: साहिर
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